सपा और बसपा मान रही हैं कांग्रेस को बेअसर
यू पी में कांग्रेसी कार्पोरेट से मिलने वाले चंदे को तीन तेरह करने
तक सीमित

आगर:उत्तर प्रदेश विधान सभा के 2017 में होने वाले चुनाव में कांग्रेस के जमीनी संघर्ष मेंउतरने के आसार एक बार पुन: अधर में लटक चुके हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनियां गांधी सीटें जीतने के लिये वोट की राजनीति करने के लिये व्याकुल हो किन्तु पार्टी के दिग्गजों का एक वर्ग वोट की राजनीति की जगह नोट की राजनीति करने कोई मौका नहीं छोडना चाह रहा। कार्पोरेट सैक्टर से राजनैतिक चंदे के रूप में मिलने वाली राशि का बडा हिस्सा उ प्र के चुनाव अभियान पर खर्च होना है।.. प्रत्याशी, स्टार प्रचारक, आब्जर्बर , कॉर्डीनेटरों के खर्च के नाम पर यह धन खर्च किया जाना है।चुनाव की तैयारियों की बात जरूर चल रही है किन्तु आंतरिक रूप से कांग्रेसी श्रीमती प्रियका बढेरा और श्रीमती शीला दीक्षित के नामों पर अखाडा जमा चुके हैं।श्रीमती बढेरा का पाला इस मामले में ज्यादा बजनी है। सबसे दिलचस्प यह है कि भाजपा के सांसद वरुण गांधी का नाम कांग्रेस में उडाले जाने के बाद अब तक किसीभी जिम्मेदार ने न तो प्रतिक्रिया ही दी है और नहीं श्री वरुण गांधीने ही संभावनाओं का अपने स्तर से प्रतिवाद किया है। कांग्रेस को बसपा और सपा ने पिछले 15 साल से असरदार राजनैतिक दल के रूप में लेना बन्द किया हुआ है। बस अगरा कुछ चिता रहती है तो सैक्युलर राजनीति के नाम पर मुस्लिम वोटों के बंटने को लेकर। फिलहाल कांगेस को सपा फ्रेंडली कंटैस्ट वाला राजनैतिक सहयोगी मान रहे हैं। आंतरिक स्थिति यह है कि कांग्रेस की गति रालाद की सी मानी जा रही है।