3 फ़रवरी 2023

आजादी के बाद 1955 में स्थापित हुआ था आगरा का पहला होटल

 

आगरा - गोवर्धन होटल ताज सिटी का पहला होटल है जो 1955 में भारत की आजादी के बाद  स्थापित किया गया था। शहर के साथ साथ यह होटल विकसित हुआ है। इसे आगरा का ऐतिहासिक होटल कह सकते हैं। यह होटल पुराने दिल्ली गेट के नज़दीक  स्थित है।गोवर्धन होटल कमरे और गलियारे अब सब कुछ काफी बदल चुके हैं  हैं  किन्तु वे अभी भी अतीत की आवाज़ों को प्रतिध्वनित करते हैं। आगरा के लोग गोवर्धन होटल को  एक प्रमुख लैंडमार्क  के रूप में मानते हैं । इसकी स्थापना स्व. श्री  सुरेंद्र शर्मा ने की थी ।

30 जनवरी 2023

आगरा की स्टार्टअप जो पर्यटकों को अनदेखी जगहों और पुरानी गलियों में कराती है सैर

 

आगरा के युवा ऋतिक गुप्ता ने अपने शीर्ष एमबीए कॉलेज में प्रवेश  को ठुकराते हुए ट्रोकल्स  नाम के एक ट्रेवल स्टार्टअप  की स्थापना की थी । ट्रोकल्स का अर्थ है ट्रेवल लोकल। इस स्टार्टअप  के जरिये वह पर्यटकों को आगरा की छिपी विरासतों तथा संस्कृति तक पहुँचाना  चाहते हैं, जिनके बारे में आम टूरिस्ट गाइड्स में नहीं लिखा हुआ है ।ऋतिक गुप्ता अपने जीवन में  क्या करना चाहते हैं , इसका निर्णय नहीं कर पा रहे थे । उनके पास दो विकल्प थे अपने पारिवारिक व्यवसाय में शामिल होना या उच्च शिक्षा प्राप्त करना। उन्होंने शीर्ष एमबीए कॉलेज में प्रवेश मिलने के बावजूद  बाद इसे ठुकराते हुए एमबीए नहीं करने का फैसला किया तथा 2019 में उन्होंने  ट्रोकल्स स्टार्टअप की स्थापना  जो आगरा की अनदेखी तथा अंडररेटेड गलियों और उपनगरों में टूरिस्टों को सैर कराती  है। वह अपने गृहनगर की समृद्ध कला, संस्कृति और छिपी विरासत को दिखाने और खोजने में सदैव उत्साहित रहते हैं। 

28 जनवरी 2023

ए एच व्हीलर बुक स्टोरों की शुरुआत एमिली मोरे ने इलाहाबाद से की थी

 

आपने भारत के अधिकांश रेलवे स्टेशनों पर ए.एच.व्हीलर के बुक स्टाल देखे होंगे , पुस्तक पत्रिकाएं भी खरीदी होंगी। क्या आपको पता है इसके  पीछे दिमाग एक फ्रांसीसी व्यक्ति एमिली मोरे  का था, जो 1857 के दौरान इलाहाबाद में आये हुए थे । यह फ्रेंच आदमी एक  स्थित अंग्रेजी फर्म बर्ड एंड कंपनी का प्रतिनिधत्व करता था। मोरो  को  किताबों से बहुत लगाव था। वह  इलाहाबाद से जाना चाहते थे, किन्तु उनके पास सबसे बड़ी मुश्किल बात थी कि वह अपने पुस्तकों, पत्रिकाओं के पूरे संग्रह को कैसे निपटाएं। एक दिन मोरे ने इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर महसूस किया  कि रेल यात्री समय व्यतीत करने के लिए पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए लालायित रहते हैं। बस इसी समय  उन्होंने संभावनाओं को देखते हुए एक बुक स्टोर स्थापित करने का निर्णय लिया । उन्होंने बुक स्टोर को  नाम दिया आर्थर हेनरी व्हीलर , जो उनके एक करीबी दोस्त थे और उस समय लंदन के प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं में से एक थे। उन्होंने सोचा  कि एक अंग्रेजी नाम का बेहतर  ब्रांड मूल्य हो सकता है । और इस तरह 1877 में इलाहाबाद से ए.एच. व्हीलर की शुरुआत हुई।

रेलवे के विस्तार के साथ, बुकस्टोर्स भी सभी स्टेशनों पर फैलने लगे, और जल्द ही ए.एच. व्हीलर सभी रेलवे प्लेटफार्मों पर एक आम दृश्य था, जो यात्रियों के साथ-साथ पढ़ने के शौकीन लोगों को भी आकर्षित करता था। प्रारंभ में यह केवल अंग्रेजी बोलने वाली आबादी को ही पूरा करता था, अधिकांश कर्मचारी भी अंग्रेज या एंग्लो इंडियन थे।

27 जनवरी 2023

पहला पनीर नान परोसा था बंबई के गुप्ता परिवार के अन्नपूर्णा रेस्तरां ने पेरिस में

 

नान खाना , यह एक प्राचीन भारतीय परंपरा है, सिवाय इसके कि भारत में इसे पनीर से स्टफ नहीं किया जाता है । किन्तु यूरोप के सभी भारतीय रेस्तरां में पनीर नान सबसे अधिक लोकप्रिय परोसी जाने वाली ब्रेड है। पनीर नान को पहली बार अन्नपूर्णा रेस्तरां में परोसा गया था, जिसे आज भी एक भारतीय द्वारा स्थापित पेरिस में पहला भारतीय रेस्तरां माना जाता है।अन्नपूर्णा रेस्तरां ने नान को पनीर की लेयर से स्टफ करके पहली बार 1967 में इस रूप में परोसा गया था। पनीर नान का दावा पिछली शताब्दी से फ्रांस में बसे एक भारतीय परिवार द्वारा किया जाता है। मूल रूप से बंबई के रहने वाले गुप्ता परिवार ने 1960 के दशक के अंत में पेरिस में पनीर नान में विशेषज्ञता वाला अपना पहला भारतीय रेस्तरां खोला। हांलांकि भारत में पनीर नान इतना प्रचलित नहीं है , किन्तु फ्रांस में पनीर नान उपभोक्ता के अचेतन में भारतीय पाक कला का एक बुनियादी घटक बन गया है। सादा नान भी यूरोप के देशों में बहुत लोकप्रिय है। इसे सादा या मक्खन से चुपड़कर परोसा जाता है। बहुत से लोग इसे अदरक और हल्दी के साथ भी पसंद करते हैं।

23 जनवरी 2023

आगरा का प्रिया लाल फोटो स्टूडियो स्थापित हुआ था 1878 में

 

आगरा - यदि भारत में फोटोग्राफी की बात की जाय तो 1878 में स्थापित प्रिया लाल फोटो स्टूडियो को शायद ही कभी भुलाया जा सके। 136 वर्ष पूर्व प्रिय लालजी ने फोटो क्लिक करना तब शुरू किया जब भारत में फोटोग्राफी अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी। वर्तमान में  प्रिय लाल परिवार की छठी पीढ़ी द्वारा फोटोग्राफी किया जाना अब भी जारी है। यह  स्टूडियो वास्तव में खास आकर्षण रखता है। उन्होंने शादी समारोहों से सबसे कीमती तस्वीरें लेने के लिए भारत में ही नहीं  दुनिया भर में यात्रा की । इसकी शैली को कल्पना की समकालीन और चित्रांकन शैलियों के बीच एक संलयन के रूप में वर्णित किया जा सकता है और फिल्म के प्रति इसका दृष्टिकोण फोटोजर्नलिस्ट की तरह  कहानी कहने वाला है। प्रिया लाल ने आगरा की कई तस्वीरें क्लिक की थीं और उन्हें इंग्लैंड की महारानी को भेंट किया था। स्टूडियो ने हर प्रसिद्ध व्यक्ति जैसे नेहरू , इन्दिरा गाँधी अमिताभ बच्चन आदि  को अपने कैमरे से क्लिक किया है ।

22 जनवरी 2023

भारत की सबसे सुन्दर कॉलेज इमारतों में से एक है आगरा का सेंट जॉन्स कॉलेज

 

आगरा। यदि भारत की सबसे सुन्दर कॉलेज इमारतों को ढूंढा जाय तो वह आगरा में है। इंडो-सरैसेनिक वास्तुकला में लाल बलुआ पत्थर में बना आगरा का सेंट जोन्स कॉलेज  भारत की सबसे खूबसूरत इमारतों में से एक है। सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा की स्थापना 1850 में इंग्लैंड की चर्च मिशनरी सोसाइटी द्वारा आगरा सी.एम.एस. के प्रयासों से की गई थी। इस प्राचीन  कॉलेज के पहले प्राचार्य रेव थॉमस वाल्पी फ्रेंच थे। उन्होंने इसकी स्थापना के समय, कॉलेज का  पाठ्यक्रम तैयार किया और  परीक्षा आयोजित की। 1862 से 1888 तक कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय और बाद में 1927 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध रहा। 1927 में आगरा विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ए.डब्ल्यू. डेविस इसके पहले कुलपति बने और कॉलेज आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध हो गया।शताब्दी विंग की आधारशिला 1958 में भारत के पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा रखी गई थी ।

सेंट जॉन्स कॉलेज ने अपनी शुरुआत से ही शिक्षा के विस्तार के लिए प्रयास किया, शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय की व्यवस्था और दलितों के उत्थान को अपनी प्रमुख चिंताओं में से एक के रूप में रखा। पहले अनुसूचित जाति के छात्र को 1892 की शुरुआत में प्रवेश दिया गया था। कॉलेज 1891 में बी.ए. के साथ प्रथम श्रेणी का कॉलेज बन गया था । 

20 जनवरी 2023

फुर्तीली उंगलियों पर नाचती कठपुतलियां शाही दरबारों के मनोरंजन का साधन थीं

 

कलाकार की फुर्तीली उंगलियों पर नाचती हुई कठपुतलियों का प्रदर्शन आपने अवश्य देखा होगा। ये कठपुतलियां  चुलबुले रंग, तेज चेहरे की विशेषताएं, निपुण चाल, एक विशिष्ट पारंपरिक अवतार में चीखती आवाजें और सीटियों से उत्साहित दर्शकों के सामने कलाकार द्वारा नचाई  जाती हैं ।

"पुतली भाट" इस कला की खोज करने वाले पहले लोग थे। ये मूल रूप से  राजस्थान की जनजातियाँ थीं जो अपनी स्व-निर्मित कठपुतलियों को लेकर विभिन्न गाँवों की यात्रा करती  थीं और  विशाल जनसंख्या का  मनोरंजन करती थीं तथा अपनी रोजी-रोटी कमेटी थीं । धीरे धीरे  इस कला ने राजस्थान के शाही घरानों में  लोकप्रियता हासिल की।धीरे धीरे भाट समुदाय विभिन्न राज्यों में बस्ते गए  तथा कठपुतलियों द्वारा शाही दरबारों के  मनोरंजन का साधन बन गए । शाही दरबारों के राजाओं और रानियों से उनके काम के लिए उन्हें बहुत सम्मान और सराहना मिली।

राजस्थान के महाराजाओं को कला और मनोरंजन का शौक था जिसके कारण उस समय कठपुतली नृत्य खूब फला-फूला। इस कठपुतली नृत्य की विशेषता यह थी कि यह न केवल मनोरंजन का साधन था बल्कि समाज को सामाजिकऔर नैतिक शिक्षा भी देता था।


19 जनवरी 2023

विदेशी आगंतुकों की नई पसंदगी ताज सिटी आगरा का कोलोनियल वॉक

 

विश्व प्रसिद्ध शहर आगरा सिर्फ ताज और अन्य मुगल स्मारकों के लिए ही नहीं है, यह ब्रिटिश राज के दिनों से औपनिवेशिक संरचनाओं का खजाना भी है। ताजमहल देखने आये आगुन्तकों के मध्य  आगरा में कोलोनियल वॉक करना बहुत लोकप्रिय होता जा रहा है । इस वॉक का उद्देश्य आगंतुकों को शहर की औपनिवेशिक वास्तुकला और विरासत स्मारकों से अवगत कराना है। इसके दौरान आप आगरा छावनी, सेंट जॉर्ज कैथेड्रल, हैवलॉक मेमोरियल चर्च, सेंट मैरी चर्च और कुछ अन्य पुराणी इमारतों को देखने का अवसर पाते हैं ।

 कोलोनियल वॉक का उद्देश्य शहर के औपनिवेशिक वास्तुकला और विरासत स्मारकों, व्यक्तिगत, शिक्षाप्रद और कल्पनाशील के बारे में आगंतुकों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है, वॉकिंग टूर स्थापत्य शैली, योजना तत्वों और सजावटी विवरणों की विशाल श्रृंखला को उजागर करते हैं, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का पता लगाते हैं। वॉक का मुख्य  आकर्षण छावनियों के बंगले जॉर्ज कैथेड्रल, हैवलॉक मेमोरियल चर्च पोस्ट ऑफिस ,सेंट मैरी चर्च, क्वीन एम्प्रेस मैरी लाइब्रेरी, टेलीग्राफ कार्यालय सदर बाजार, मदर टेरेसा अनाथालय आदि हैं। 

16 जनवरी 2023

रेलवे के इतिहास को जानने के लिए आगरा के हेरिटेज स्टेशनों को अवश्य देखें

 

आगरा के हेरिटेज रेलवे स्टेशन देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण हैं। ब्रिटिश काल में बने ताज सिटी के अधिकांश  रेलवे स्टेशन न केवल कार्यात्मक इमारतें हैं बल्कि अपने आप में पर्यटन स्थल भी हैं। ये न सिर्फ खूबसूरत हैं बल्कि इनके पीछे लम्बा इतिहास भी है। आगरा छावनी रेलवे स्टेशन मूल रूप से 1875 में दिल्ली-आगरा रेलवे लाइन के हिस्से के रूप में बनाया गया था। यह भारत के सबसे पुराने रेलवे स्टेशनों में से एक  है। 

1903 में शहर के बीचों  बीच बनाया गया आगरा सिटी रेलवे स्टेशन अति महत्वपूर्ण एवं आकर्षक भवन है । आगरा की ओल्ड सिटी में होने के कारण यह स्टेशन शहर की व्यावसायिक आवश्यकताओं को पूरा करता था । वह समय था जब एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए ओवर ब्रिज नहीं बनाए जाते थे और आगरा सिटी रेलवे स्टेशन पर इसके लिए अंडरपास बना हुआ है। इस अंडरपास में रोशनी लगाकर टूरिस्ट आकर्षण के रूप में  और अधिक विकसित किया जा सकता है।

 1903 में बने इस स्टेशन का विरासत मूल्य बढ़ाने के लिए इसका नवीनीकरण कर  इसे पर्यटकों के आकर्षण विकसित करने तथा एक रेलवे संग्रहालय स्थापित करने की आगरा के लोगों की मांग जारी है ।

आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन का निर्माण औपनिवेशिक काल में किया गया था। यह स्टेऑन भी  भारत के सबसे पुराने रेलवे स्टेशनों में से एक है। पहले यहाँ  छोटी लाइन और बड़ी लाइन हुआ करती थीं किन्तु अब यह पूरी तरह से ब्रॉड गेज रेलवे स्टेशन है। ईदगाह रेलवे स्टेशन आगरा के  रेलवे इतिहास का महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ  राजपुताना स्टेट रेलवे की 1,000 मिमी (3 फीट 3+3/8 इंच)-चौड़ी मीटर-गेज दिल्ली-बांदीकुई और बांदीकुई-आगरा लाइन 1874 में शुरू  गई थी।

14 जनवरी 2023

आगरा के निकट लाल पत्थरों की भूमि धौलपुर सांस्कृतिक विरासत में बेहद समृद्ध

 

धौलपुर -पत्थर की खदानों और अपने दस्यु पीड़ित खंडहरों के लिए जाने जाना  वाला धौलपुर राजपुताना के प्रसिद्ध लाल बलुआ पत्थर का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है। आगरा से 55 किलोमीटर दूरी पर  स्थित धौलपुर के प्रसिद्ध लाल बलुआ पत्थर का उपयोग सदियों से कई महलों और महत्वपूर्ण संरचनाओं के निर्माण के लिए किया गया था । दिल्ली का किला धौलपुर के लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया था, जिसने किले को अपना नाम दिया। नई राजधानी को डिजाइन करते समय, लुटियन ने लाल बलुआ पत्थर का उपयोग करने का भी फैसला किया था  शायद निरंतरता के लिए किन्तु  धौलपुर खदानों से पत्थरों की उच्च गुणवत्ता के कारण भी।

धौलपुर एक शांत शहर अपनी प्राचीनता और प्राचीन इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। धौलपुर क्षेत्र भारत की स्वतंत्रता तक एक रियासत हुआ करता था। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि उस समय इसे धवलपुरी कहा जाता था। आगरा और ग्वालियर के बीच स्थित होने के कारण, कई साम्राज्यों द्वारा वांछित सबसे महत्वपूर्ण इस ऐतिहासिक शहर ने एक समय के दौरान कई खूनी लड़ाइयों को भी देखा है। धौलपुर की ऐतिहासिक कहानी में उत्पत्ति और कालक्रम के कई रहस्य छिपे हैं।

13 जनवरी 2023

उपक्रमों और स्टार्टअप इकाइयों शुरू करने के इच्छुक आगरा के युवाओं व उद्यमियों के लिए अच्छी खबर

 

( राजीव सक्सेना ) आगरा - इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़े छोटे उपक्रमों और स्टार्टअप इकाइयों शुरू करने के इच्छुक आगरा के युवाओं व उद्यमियों के लिए अच्छी खबर है।सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क ऑफ इंडिया द्वारा आगरा के लिए बनाए जा रहे एसटीपीआई केंद्र का निर्माण पूरा हो गया है।

केंद्र के औपचारिक उदघाटन की दिशा में भी कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई है। इस परियोजना का लाभ आगरा के युवाओं और उद्यमियों को मिल सके ,इसके लिए एसटीपीआई द्वारा राज्य सरकार ,उद्योग संघों, उद्यमियों, शिक्षाविदों इत्यादि से विमर्श हेतु पहल की गई है। एसटीपीआई के अनुसार ऐसी पहली बैठक विगत नवंबर माह में आयोजित की गई। यह आशा की जाती है कि आईटी सेक्टर से जुड़े युवा  पहल कर सेंटर में उपलब्ध इनक्यूबेशन सुविधा का लाभ उठाएंगे। एस टी पी आई द्वारा इस संबंध में आवेदन पत्र आमंत्रित किए जा रहे हैं। इस बारे में एसटीपीआई नई दिल्ली से पत्र दिनांक 13 जनवरी 2023 प्राप्त हुआ है , जिसमें उक्त आशय की जानकारी दी गई है। 


12 जनवरी 2023

आगरा के बलूचियों को गंगा के मैदान के आलीशान परिदृश्य से बहुत प्यार था

 

आगरा। बिलोचपुरे में बलूची जातीय समूह के लगभग 8,000 लोग रहते थे। इन बलूची लोगों  के पूर्वज बलूचिस्तान से थे। बिलोचपुरे  को भारत सरकार द्वारा क्रांति ग्राम के नाम  से सम्मानित किया गया है। इसके निवासी  अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर की सेना में लड़े थे। यहाँ के लोग 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई के समय मुगल  सम्राट बाबर की सेना में तोपखाने के रूप में कार्यरत थे। बलूचियों ने इस  क्षेत्र में रहने का फैसला किया, जिसका नाम उनकी मातृभूमि के नाम पर रखा गया था। इन लोगों को  गंगा के मैदान के आलीशान परिदृश्य से बहुत प्यार था इसी कारण  उन्होंने यमुना के किनारे बसने का फैसला किया। 2018 में, बलूची अलगाववादी नेता मजदक दिलशाद बलोच ने अपनी पत्नी के साथ बिलोचपुरा का दौरा किया, ताकि गांव के बलूची भारतीय निवासियों से समर्थन प्राप्त किया जा सके। यहाँ एक रेलवे स्टेशन भी है।