-नया सत्र शुरू करने में खडी हो सकती हैं भारी मुश्किलें
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| सी बी एस ई मुख्यालय भी कोरोना की चपेट से मुक्त नहीं |
आगरा: कोरोना संकट से उबरने के दौर में अर्थव्यवस्था के गडबडाने का असर कई अन्य क्षेत्रों के समान ही शिक्षा क्षेत्र पर भी पडने जा रहा है । चालू शिक्षा सत्र तो स्टूडैंट्स को प्रमोशन,ग्रेस मार्क्स या एवरेज नम्बर देकर किसी प्रकार से पूरा हो जायेगा किन्तु अगला शिक्षा सत्र जो कि सामान्य रुपसे अप्रैल महा से शुरू हो जाता है को, लेकर अनिश्चित्ता की स्थति बन गयी है।
-- सी बी एस ई विद्यालयों पर सबसे ज्यादा असर
हालांकि उच्च शिक्षा और तकनीकि शिक्षा देने वाले निजि प्रबंधन में संचालित शिक्षण संस्थानों मे भी आगामी शिक्षण सत्र को लेकर अनिश्चय के हालात हैं किन्तु माध्यमिक शिक्षा परिषद और सी बी एस ई से संबद्ध निजी प्रबंधन के स्कूलों में हालात और भी अधिक पेचीदगी भरे हैं। ज्यादातर प्रबधक यह नहीं समझ पा रहे है कि चालू शिक्षण सत्र को किसी प्रकार से पूरा करने के बाद गडबडाई वित्तीय स्थति में नया शिक्षण सत्र
कैसे शुरू किया जाये।
सामान्य तौर पर परीक्षा परिणाम घोषित होने के साथ ही नये सत्र के लिये फीस कलैक्शन के साथ ही रि-एडमीशन या नये अभ्यार्थियों से एडमीशन फीस प्राप्त होना शुरू हो जाती है। इस फीस संग्रह से प्राप्त धन का बडा भाग ग्रीष्म अवकाश घोषित होने पर स्कूल के शिक्षणेत्तर स्टाफ एवं शिक्षकों दो महीने तक के वेतन व अन्य देयों का भुगतान किया जाता है। इसी अवकाश अवधि में स्कूल के भवन प्रयोगशालाओं तथा स्पोर्टस फील्ड अगर हो तो, उनका मेटीनेंस करवाया जाता है।
--स्टाफ को सैलरी जुटाना भी अधिकांश को चुनौतीपूर्ण
वर्तमान में मुख्य मुद्दा स्कूल के स्टाफ को सरकार की नीति के अनुसार वेतन वितरण का है। जैसा कि सर्वविदित है कि प्रदेश के सभी स्कूल, स्वैच्छिक संगठनों औा गैर मुनाफा कमाने वाले ट्रस्टों आदि के द्वारा संचालित हैं। यही नहीं शासन ने भी शिक्षा को गैर मुनाफा कमाने वाला कार्य बनाया रखना सुनिश्चित करने के लिये समय समय पर आदेश भी जारी किये हुए हैं। सैंट्रल बोर्ड आफ सैकेडी एजूकेशन के 3जून 2016 को जारी सर्कुलर (सर्कुलर संख्या दिनांक CBSE/AFE/cIRCULARS/ 2026 दिनांक 03/06/2016) ने स्कूल संचालकों के फीस वसूली और संचालन के अधिकारों को और अधिक सीमित कर दियाजो कि पहले से ही काफी सीमित थे।
--फीस वसूली के सीमित अधिकार
बाद में फीस वसूली और संबधित अधिकारों को और अधिक सीमित करने के लिये उ प्र शासन के द्वारा भी सर्कुलर/ शासनादेश जारी किये गये । इस क्रम में नवीनतम आदेश अध्यादेश के रूप में 2018 में लाया गया था(Self-Financed Independent Schools (Regulation of Fees) Bill 2018, ) ,जो कि वर्तमान में शासन की नीति के रूप मे प्रभावी है। अब इसके तहत मुनाफा कमाना तो बाद की बात है,फीस तक शासन स्तर से ही निर्धारित मानकों के अनुसार ही तय होती है।
-- आर टी ई एक्ट से भी अवस्थापना सुविधाओं पर पडा भार
उपरोक्त के अतिरिक्त लखनऊ से निशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (अधिकार अधिनियम ,2009 की धारा 12(1)(ग) ) के अंतर्गत अलाभित समूह एवं दुर्बल बग्र के बच्चों की कक्षा - 1/ पूर्व माध्यमिक कक्षा में आनलाइन प्रवेश प्रक्रिया से संबधित शिक्षाका अधिकार राज्य परियोजना कार्यालय निशातगंज लखनऊ की अपर परियोजना निदेशक द्वारा निर्गत ( पत्रांक :31 / सामु .सह./ आर टी ई/ 4960/ 2016-17 दिनांक :6फरवरी,2017 के डाटाफीडिग एवं फ्रीजिग संबधी दिशा - निर्देश - ।. के तहत (ग)(घ)(ड.) के प्राविधान) के प्राविधानों का अनुपालन की अनिवार्यता के बाद से तो मान्यता प्राप्त गैर अनुदानित विद्यालयों ( जिनके तहत सी बी एस ई विद्यालय भी आते हैं) के संचालकों के सामने स्कूल का संचालन और भी अधिक चुनौती भरा हो गया है। यही नहीं इससे स्कूल की सीमीत आर्थिक व्यवस्थाओं से सृजित अवस्थापना सुविधाओं पर अतरिक्त अधिभार ही पडा है।
-- अबतक कोयी आदर्श मॉड्यूल नहीं
केन्द्र सरकार सहित भारत की जितनी भी प्रांतीय सरकारें हैं , उनमें से शायद ही किसी की नीति शिक्षा देने के काम का व्यवसायी करण करने की रही हो किन्तु वहीं किसी ने भी अब तक शिक्षा क्षेत्र में स्वैच्छिक योगदान देने की चाह रखने वालों को प्रोत्साहित करने का कोयी भी 'मॉड्यूल' अब तक सामने लाने का काम नहीं किया है। नहीं दीर्घकालीन स्वीकारिता वाला कोयी प्रक्रिया ही सामने लायी जा सकी है।
फिलहाल देश में शिक्षा के कार्य में योगदान देने वाली संस्थाये और ट्रस्ट अनिश्चय की स्थति में है, उनके पास न तो अपना कोयी सुरक्षित कोष है और नहीं सरकार की ओर से इंडस्ट्रियों की तरह किसी राहत पैकेज मिलने की संभावना है। वह भी इसके बावजूद कि जहां इंडस्ट्रियां मुनाफे के लिये चलायी जाती है , शिक्षा संस्थायें केवल समाज के लाभ को आगे रख कर।
--कई संस्थान स्थायी लॉकडाउन की स्थति में जा पहुंचेगे
निजी प्रबंधन वाली शिक्षण संस्थाओं के समक्ष ताजी चुनौती उस महौल से हुई है जोकि फीस न देने को लेकर बनाये जाने की चल रही है। वित्तीय प्रबंधन में महत्वपूर्ण योगदान का आधार फीस न देने की जोर पकड चुकी आवाज को सरकार में असर रखने वाला एक वर्ग बिना शिक्षण संस्थानों के संचालकों और प्रबंधकों से उनका पक्ष सुने या विकल्प विचारे अपना समर्थन दे रहा है। इस कार्य से कुछ को त्त्कालिक रूप से लोकप्रियता तो जरूर मिल जायेगी किन्तु दूरगामी परिणामों के रूप में कई शिक्षण संस्थानों के लिये अगला शिक्षा सत्र शुरू करना और अपने यहां सेवारतो को काम पर बरकरार रखना तक एक गंभीर समस्या बन जायेगा।
-- कदम जो सरकार से अपेक्षित
कोरोना वायरस के प्रभाव का राष्ट्रव्यापी अर्थव्यवस्था पर भी असर हुआ है,जाहिर है कि ऐसे में सिस्टम को ढर्रे पर बनाये रखना एक बडी चुनौती है। निजि क्षेत्र के अव्यवसायिक संस्थानों के लिये यह समय और भी गंभरता पूर्ण है। ऐसे में सहायता के तौर पर सरकार अगर उनबच्चों की फीस का इंतजाम करवा सके जो न तो किसी भी प्रकार का स्कालरशिप पाने के हकदार की श्रेणी में हैं और नहीं उनके पालक फीस चुकाने की स्थति में ही । तो बनना शुरू होने जाउरही समस्याओं का आरंभ में ही स्वत: समाधान हो जायेगा। एक अन्य विकल्प संस्थानों वे वेतन भोगियों के दो महीने का वेतन पैकेज के रूप में प्रदान कर भी समस्या को काफ हद तक सीमित किया जा सकतता है।
सीबीएस ई शिक्षण संस्थाओं के संगठन से पदाधिकारी के रूप में निकटता रखने वाले श्री आर के सचदेवाने कहा है ,चूकि वह संगठन से जुडे हुए हैं इस लिये ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे जो कि नीतिगत तौर पर तय होना हो । किन्तु स्कूलों के वित्त प्रबंधन की जानकारी होने से व्यक्तिगत तौर पर इतना जरूर कहना चाहते है कि ऐसा महौल बनने से रोका जाना चाहिये जिससे वे गार्जियन भी फीस देन से पीछे हटने लगें जो कि इसके लिये तैयार व सक्षम हैं। वैसे तो सरकार को आगे आना चाहिये और अन्यक्षेत्रों के समान ही सैलरी या स्टूडैंटों की एवरेज फीस के हिसाब से 'लॉक डाउन' का पैकेज दे कर मौजूदा दौर में स्कूलों को राहत दिलवा सकती है। श्री सचदेवा ने कहा कि द्वापर युग हो या कलयुग हरकाल में 'संदीपन ऋषि के आश्रम' शिक्षा देने को रहे है जिनमें कृष्ण ही नहीं सुदामा भी शिक्षा गहण करते हैं। सी बी एस ई और माध्यमिक शिक्षा परिषद के विद्यालय भी कमोवेश उसी स्थापित संस्कृति के वाहक हैं।
