3 मार्च 2016

छात्र बनने का ढकोसला छोड सीधी राजनीति करें ‘कन्हैया’

दिल्‍ली में बैठकर बिहार की सूरत बदलने का असफल प्रयोग कई बिहारी बाबू कर चुके हैं

यूनीवर्सटियां शिक्षा का केंद्र  बने या फिर उस राजनीति की लडाई का मंच जिसके लिये प्रजातंत्र  में
(जे एन यू अध्‍यक्ष के भी बदल सकते हैं तेबर)

अलग से व्‍यवस्‍था है। बिहार से दिल्‍ली की जे एन यू पहुंचे कन्‍हैया ने जो कुछ भी पहले किया हो उसका एक बडा भाग न्‍यायालय के तहत विचारित है, इसलिये इस पर कुछ भी कहना शायद उपयुक्‍त न हो किन्‍तु अब वह शिक्षण संस्‍थान को जिस प्रकार से राजनैतिक मंच के रूप में उपयोग कर रहे है, वह निश्‍चित रूप से उस हर आम आदमी के लिये सोच का विषय है जिसके पैसे से तमाम जरूरी प्राथमिक्‍तायें दरकिनार कर सरकार के द्वारा जे एन यू जैसे बेहद खर्चीले संस्‍थान संचालित हैं।..
बेहतर  हो कि कन्‍हैया छात्रों की भीड में घुस कर राजनीति करने के स्‍थान पर खुल कर राजनीति करें। देश में प्रधानमंत्रियों के खिलाफ बोलने वाले  कन्‍हेया नये नहीं हैं । अपनी स्‍वभाविक नियति से दम तोडते जातिबाद के दंलदल से पुन: संस्‍कारी करने वालों में सबसे आगे रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्‍व वी पी सिह तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पिता स्‍व राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में रहते हुए भी उनके खिलाफ बोलकर अपने समय के प्रमुख विपक्षियों से कही तगडे साबित होते रहे थे। यही नहीं मौका आते ही परहेजी विचारधारा वाली भाजपा से गठबन्‍धन कर सरकार भी बना डाली थी। किन्‍तु उनकी सरकार और पार्टी ‘‘जनता दल का क्‍या हुआ यह सबके सामने है। यही नहीं जिस बोफोर्स की खरीद को लेकर जो हल्‍ला उन्‍हों ने रक्षामंत्री जैसे महत्‍वपूर्ण पद पर रहते हुए मचाया था वही पाकिस्‍तानी घुसपैंठियों के कारण कारगिल युद्ध के समय भारत के लिये सबसे उपयोगी साबित हुई।
 कन्‍हैया के समान ही कई कांग्रेसियों और गैर कांग्रेसियों ने स्‍व पी वी नरसिम्‍हा राव के खिलाफ भी क्‍या नहीं बोला । बोलने वाले यह भी भूल गये थे कि स्‍व राव एक महान चिंतक  है, और देश के खजाने को खाली कर देने वाली व्‍यवस्‍था से उन्‍हीं के कार्यकाल में मनमोहन सिह निजात का रास्‍ता तय करा सके थे।
एक, दो  नहीं बल्‍कि प्रधानमंत्रियों के खिलाफ बोलने वालो का पुराना सिलसिला है जो आगे भी चलता रहने वाला है,हकीकत में यह राजनीति में आगे बढते रहने ही स्‍ट्रेटजी है। जिसमें जनता के द्वारा पंच साल के लिये चुनी हुई सरकार को काम करने देना जैसी संवैधानिकपरंपरा को लगभग तिलांजली सी ही है।  जिसे कि अब श्री कन्‍हैया के माध्‍यम से कई सिद्धहस्‍त अपनाने को प्रासरत थे यह बात तो अलग है कि अब तो श्री कन्‍हैया खद ही इसके खिलाडी हो चुके हैं।  

 कन्‍हेया के बकौल वह बेरोजगारी ,बिहार के पिछडे पन जैसी बीमारियों से लडना चाहते है वह भी दिल्‍ली में बैठकर । समझ से परे है। बिहार के पिछडे दिन आज के नहीं हैं स्‍व बाबू जगजीवन राम, श्रीमती मीरा कुमार, भगबत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद,शरद यादव, शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, लालू यादव आदि दिल्‍ली में बैठकर  दशकों से लडते रहने के चैम्‍पियन रहे किन्‍तु बिहार पिछडता ही नहीं रहा दो भागों में बंट भी गया। जनाब अगर लडना ही हो तो बिहार जाकर सुधार की कोशिश करें जहां सरकारे स्‍पेशल पैकेज की बीमारी की शिकार है ओर नान प्‍लान एक्‍सप्रेडीचरों से सरकारी धन की तीन तेरह कियेजा रही है ।