राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले की ग्रामीण संस्कृति में मंडाना पेंटिंग की परंपरा सदियों से जीवित है। यह कला मुख्य रूप से गाँव की महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों और आंगनों पर बनाई जाती है और इसे धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों के लिए सजावट का माध्यम माना जाता है।
मंडाना पेंटिंग की शुरुआत तब होती है जब महिलाएं मिट्टी और गोबर की मिश्रित सतह तैयार करती हैं। इसके बाद चाक या चूने के पानी से जटिल डिज़ाइन खींचे जाते हैं। इन डिज़ाइनों में अक्सर पक्षी, जानवर, फूल, ज्यामितीय आकृतियाँ और गाँव का रोजमर्रा का जीवन चित्रित होता है।
मंडाना पेंटिंग की विशेषताएँ और महत्व
इस कला की विशेषता इसकी सादगी और प्राकृतिक सौंदर्य है। इसमें उपयोग होने वाले रंग प्रायः प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते हैं, जिससे यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित होती है। मंडाना पेंटिंग केवल सजावट नहीं है, बल्कि इसे घर में सुख, समृद्धि और देवी-देवताओं का स्वागत करने का प्रतीक भी माना जाता है।
त्योहारों और विशेष अवसरों पर मंडाना पेंटिंग और अधिक जीवंत हो जाती है। दीवाली, शादी और अन्य खुशियों के अवसरों पर महिलाएँ अपने घरों की दीवारों और आंगनों को रंग-बिरंगे पैटर्न से सजाती हैं। हालांकि आधुनिक घरों में कच्ची मिट्टी की दीवारें कम होती जा रही हैं, फिर भी मंडाना पेंटिंग आज भी सवाई माधोपुर के गाँवों में एक जीवित कला और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मौजूद है। यह परंपरा न केवल कला का प्रतीक है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के संस्कृति और पहचान से जुड़ाव को भी दर्शाती है।
मंडाना पेंटिंग यह दिखाती है कि कला केवल सजावट का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जीवन की अभिव्यक्ति भी है।
