25 जनवरी 2026

आगरा: मुगल काल से अंतरराष्ट्रीय जूतों का शहर

 

आगरा, जो ताजमहल और ऐतिहासिक किलों के लिए प्रसिद्ध है, अपनी जूते बनाने की परंपरा के लिए भी जाना जाता है। यह कहानी मुगल काल से शुरू होती है। उस समय आगरा मुगलों की राजधानी थी और यहाँ के कारीगर शाही दरबार के लिए सलीकेदार और टिकाऊ चमड़े के जूते बनाते थे।

दिलचस्प तथ्य यह है कि व्यापारी अरब देशों से ऊँटों पर आकर आगरा आते थे। वे अपने साथ चमड़े के विशेष थैलों में पानी लेकर यात्रा करते थे, ताकि लंबी और कठिन यात्रा के दौरान उनकी प्यास बुझती रहे। इन व्यापारियों ने आगरा के कारीगरों से चमड़े और जूतों का लेन-देन किया, जिससे आगरा में जूते बनाने की कला और व्यापार दोनों को बल मिला।


मुगल काल के जूते केवल पहनने का साधन नहीं थे, बल्कि शाही दरबार में शान और प्रतिष्ठा का प्रतीक भी थे। चमड़े की गुणवत्ता, बारीक सिलाई और कढ़ाई ने आगरा के कारीगरों की कला को दूर-दूर तक प्रसिद्ध किया। ब्रिटिश काल में यह परंपरा और मजबूत हुई और शहर का जूता उद्योग राष्ट्रीय बाजार में पहचान बनाने लगा।

1970 और 1980 के दशक में आगरा का जूता उद्योग आधुनिक मशीनों और फैक्ट्री निर्माण के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गया। आज यहाँ हजारों फैक्ट्री और पारंपरिक

कारीगर सालाना लाखों जूते बनाते हैं, जो टिकाऊ, आरामदायक और डिजाइन में सुंदर होते हैं।

इस तरह आगरा का जूता उद्योग मुगल काल के शाही व्यापार और कारीगरी से शुरू होकर आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रसिद्ध हो गया। यह कहानी यह दिखाती है कि परंपरा, कौशल और वैश्विक व्यापार की समझ कैसे एक शहर को विश्व मानचित्र पर पहचान दिला सकती है।

इस औद्योगिक यात्रा के केंद्र में रहे पुरन दावर, जिनकी दूरदृष्टि और नेतृत्व ने आगरा के जूते उद्योग को नई दिशा दी। उन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत कर यह साबित किया कि स्थानीय कौशल और अंतरराष्ट्रीय मानकों का संतुलन ही स्थायी सफलता की कुंजी है। उनके नेतृत्व में दावर ग्रुप ने न केवल विदेशी बाजारों में भरोसा बनाया, बल्कि हजारों लोगों को रोजगार भी दिया।

दावर शूज़ फैक्ट्री आज आगरा के उस औद्योगिक परिवर्तन का प्रतीक है, जहाँ मेहनत, तकनीक और परंपरा मिलकर शहर को अंतरराष्ट्रीय जूतों के मानचित्र पर मजबूत पहचान दिलाती हैं।