आधार कार्ड और बैंक एकाऊंट अपने आप में पर्याप्त साक्ष्य
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| आधारभूत सुविधाओं से बंचितों के बारे में भी विचारें:मनोज जैन। फयल फोटो |
आगरा: राशन कार्ड बनाये जाने की मोजूदा व्यवस्था एक दम नाकारा साबित हुई है, इसमें राज्य सरकार के अधिकारियों के द्वारा अनावश्यक रुप से जोडे गये डौक्यूमेंटों को समाप्त कर केवल आधार कार्ड और घर के मुखिया के बैंक एकाऊंट की जानकारी तक सीमित किया जाये। यह कहना है सिविल सोसायटी आगरा के जर्नल सैकेट्री श्री अनिल शर्मा का ।
श्री शर्मा ने कहा कि अन्य सुविधाओं और जन उत्पीडन के मामलों से जनता को निजात दिलवाने में भले ही विधायक और नगर निकायों के सदस्यों की भूमिका सरकारी तंत्र स्वीकार्य नहीं करे किन्तु आम आदमी की रोटी से जुडी जरूरत को पूरा करवाने में पार्षदों और विधायकों की भूमिका को नजरअंदाज करना उ प्र सरकार का एक गलत फैसला था। उन्होंन दावा किया कि अगर 'वन नेशन वन राशन कार्ड' योजना वाले ई-कार्ड एू पी में बनने दिये गये होते तो दिल्ली पुणे और मुम्बई जैसे इडस्ट्रियल महानगरों से
उ प्र से रोजी रोटी कमाने वालों को इतनी बडी संख्या में पलायन नहीं करना पडता।
उ प्र से रोजी रोटी कमाने वालों को इतनी बडी संख्या में पलायन नहीं करना पडता।
-- जैन समाज के मनोज ने झकझोरा स्वधर्म बांधवों को
फिलहाल सिविल सोसायटी ने जैन समाज के सुधिजनों का असरदार प्रतिनित्व करने वाले श्री मनोज जैन
के द्वारा व्यक्त की गयी चिंता को सटीक और सामायिक माना है। श्री जैन ने अपनी सटीक टिप्पणी और मनमानस को झकझोर देने वाले अपने फेसबुक के पोस्ट में लिखा था कि सरकार राशनकार्ड बनवाने में असफल साबित हुई है, श्रमिकों के नाम पर घोषित सुविधाओं का फायदा भी नाम मात्र के लोगों को ही मिल सकेगा। इनसे भी बढकर श्री जैन ने अपने समाज के उनमहानुभावों को झकझोरने वाले कार्य को याद दिलाया कि अन्य वर्गों की तो छोडे भी तो जैन समाज के संपन्न लोगों को यह मुगालता नहीं संजोना चाहिये कि उनके कष्ट दूर हो जाने भर से पूरा समाज संपन्न हो गया। उन्होंने याद दिलाया कि जैन समाज में अब भी तमाम लोग टैम्पो चलाते हैं, चाय की दूकान या छोटे मोटे खोमचे लगाने आदि के काम करते हैं जिनके काम धंधे बन्द हैं और कोरोना वायरस प्रभावित लोगों के लिये बनायी गयी किसी भी सरकारी योजना का लाभ उन्हे नहीं मिलने जा रहा है।
उधर सिविल सोसायटी के जर्नल सैकेट्री श्री अनिल शर्मा ने अपनी आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा है कि उप्र में सरकार को सबसे ज्यादा किरकिरी का सामना राशन कार्डों को लेकर करना पड़ा। खाद्य संरक्षण विधेयक 2013 एक बहुत सोच समझ कर बनाया गया अधिनियम था। इसके जिस भाग को केन्द्र सरकार को क्रियान्वयन करवाना था वह पूरी तरह से क्रियान्वित हुआ किन्तु जो भाग राज्य सरकार को क्रियान्वित करवाना था उसी में सबसे ज्यादा गड़बड़ी हुई है।
मौजूदा दौर में राशन कार्ड
अहम जरूरत:अनिल शर्मा |
--गैर जरूरी साक्ष्य मांगने से गडबडाई स्थति
राशन कार्ड बनाये जाने की सबसे गड़बड़ी की शुरूआत आवास प्रमाण का साक्ष्य और बिजली का बिल मांगे जाने के साथ हुई। लगता है कि सरकार के अलावा सभी को मालूम है कि उ प्र में जो हालात हैं, उनमें एक मकान में तीन तीन परिवार रहते हैं। संयुक्त परिवार में भी दो दो या तीन तीन गृहस्थी रहती हैं। एक ही मकान में रहने वालों के अगर आधार कार्ड बने हुए हैं तो उनके आधार पर राशन कार्ड यूनिटें दर्ज करने का काम सहजता के साथ किया जा सकता था।
इसी प्रकार से बिजली के कनेक्शन की जानकारी भी गैर जरूरी दस्तावेज है। अगर कोई मिटटी के तेल की मात्रा ज्यादा मांगता है तो उससे बिजली का कनैक्शन न होने के बारे में जानकारी ली जा सकती है। वैसे भी अगर किसी परिवार में चाहे कितने भी सदस्य रहते हों किन्तु सामान्यत: एक ही कनैक्शन होता है।
-- व्यापक हो असंगठित क्षेत्र की परिभाषा
जहां तक श्रम विभाग का सवाल है, उ प्र श्रम विभाग की मौजूदा हालत व्यापक सुधार चाहती है। असंगठित क्षेत्र की उ प्र में प्रभावी परिभाषा श्रमिकों के क्षेत्र को अत्यंत सीमित करने वाली है। निर्माण श्रमिक ही अब तक इसके लाभार्थी सही प्रकार से बन सके हैं। वह भी इस कारण क्योंकि श्रम विभाग को इनके नाम पर भवन निर्माण करने या करवाने वालों से सैस वसूली का अधिकार है। और इसी अधिकार का श्रम विभाग के इंस्पैक्टर तंत्र की भवन निर्माताओं पकड़ मजबूत हुई है।
-- ग्रामीण श्रमिक नजर अंदाज
अब जब असंगठित क्षेत्र के पंजीकृत श्रमिकों की बात करते हैं तो माना जाता है कि ग्रामीण छेत्र के श्रमिकों के अलावा अन्य क्षेत्रों के फ्रीलांस सेवा प्रदाता भी पंजीकृतों की सूची में होंगे। जबकि वस्तु स्थिति यह है कि असंगठित क्षेत्र के नाम पर पंजीकृतों में अस्सी प्रतिशत केवल भवन निर्माण श्रमिक ही पंजीकृत हैं। हालांकि इनकी संख्या भी वास्तविक संख्या की तुलना में तीस प्रतिशत भी नहीं है।
-- जब राशन कार्ड नहीं तो आयुष्मान कार्ड कैसे बने
जहां तक बात रही आयुष्मान कार्ड की तो जब राशन कार्ड ही नहीं है तो फिर आयुष्मान कार्ड कहां से होगा। सरकारी प्रोपेगंडा करने वालों को अपने द्वारा बनाये कानूनों के प्राविधानों का भी ध्यान नहीं रहता।
