16 अक्टूबर 2016

आगरा में शरद पूर्णिमा पर केवल चार सौ ही देख सके ताजमहल

भारत सरकार की ''ताजमहल की सुरक्षा नीति' से पर्यटन उद्यमियों को भारी निराशा

आगरा:ताजमहल को चांदनी रात में निहारने का चार सौ सैलानियों को ही मौका मिल सका, ये पचास पचास के  आठ ग्रुपों में लेजाये गये, आखिरी गुप रात्रि 12.30 बजे तक ही ताजमहल में रहा सका। वैसे पूरे दिन 25,970 भारतीयों और 2857 विदेशियों ने ताजमहल का टिकट खरीद कर दर्शन किया।
वैसे तो रात्रिकालीन ताजमहल दर्शन हमेशा से ही सुरक्षा की  दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील रहा है किन्तु शनिवार को ही आगरा के जगदीशपुरा थाना क्षेत्र के तहत आने वाले एक मोहल्ले  में हुए विस्फोसट की घटना को दृष्टिदगत सुरक्षा के उपाये ओर बड़ा दिये गये। ताज दर्शन करने यमुना पार मैहताब बाग पहुंचने वालों को भी भारी निराशा का समाने करनापडा। वहां इंडस्ट्रियल सीक्यूंरिटी फोर्स तैनात है, जिसका रवैया सामान्य दिवसों की तुलना में कहीं सख्त रहा। ताजगंज के होटलों में जरूर अपने महमानों के लिये रूफटाप पर ताजदर्शन करवाने को खास व्यवस्था करवा रखी गयी थी।
शरद पूर्णिमा की रात्रि पर चांदनी में नहाया हुआ ताज महल
ताजमहल को चांदनी रात में देखने का सिलसिला शाहजहां के काल से ही शुरू हो गया था, जयपुर बसाने वाले आमेर के कछवाह राजा जैय सिंह जो कि मुगलों के काल में आगरा के सूबेदार हुआ करते थे ने सबसे पहले ग्रह, उपग्रह और नक्षत्रीय अध्यन के दौरान ताजमहल की इस विशिष्टत स्थिेति काे संज्ञान में लिया था। तब से ताज दर्शन के नियम बनना शुरू होने तक आगरा के जनमानस के लिये शरदपूर्णिमा की रात एक उत्सव के रूप में आती रही।पिछले कुछ
समय से ताज महल रात्रि में देखने के कडे नियम बन गये हैं, साथ ही यह खर्चीला भी हो गया है। रात्रि में ताज दर्शन के नियमों को मूल रूप से  तो पर्यटन प्रोत्साहन और ताजमहल की सुरक्षा के लिये ही बनाया गया था किन्तु ये आगरा के आम आदमी को ताज दर्शन से काटने वाले ही साबित हुए। अब रात्रिकालीन ताज  दर्शन  शरदपूर्णिमा को बेहद खर्चीला तथा अधिकारियों की कृपा वाला होकर ही रह गया है।
उल्लेखनीय है कि ताजमहल के धवल संगमरमरी हुस्न पर जब चंद्रमा की श्वेत रश्मियां अठखेलियां करती हैं तो देखने वाले 'वाह ताज ' कह उठते हैं। शरद पूर्णिमा पर ताज की संगमरमर की ‘चमकी’ विश्लेहषण के रूप में विख्यात  चमक देखने के लिए तो सैलानी साल भर इंतजार करते हैं, मगर टिकट न मिलने से अधिकांश को भारी निराशा ही हाथ में लगती है।