14 मई 2016

तमिल नाडू में हिन्दी विरोध हाशिये पर पहुंचा

--बोट बैंक की खातिर हिन्‍दी में भी किय जा रहा है चुनावी प्रचार

  नई दिल्‍ली:आनेवाले वक्‍त में उत्‍तर भारत में असर रखने वाले राजनैतिक दलों के नेता अपनी इमेज राष्‍ट्रीय बनाये
जानेके लिये हिन्‍दी के पक्ष में एक सुर से उठती रहने वाली जनता की आवाज को अन्‍य भारतीय भाषाओं के विकास से जोड कर कमजोर करते रहे किन्‍तु जमीनी चुनावी राजनीति ने तमिल नाडू जैसे घोर हिन्‍दी विरोधी प्रांत राज भाषा के विरोध की चीखपुकरों को कमजोर कर दिया है।राज्‍य के प्रमुख राजनैतिक दल डीएमके के हिन्‍दी विरोधी सुर एक दम ठंडे पडे हुए हैं।

राज्‍य के तीस से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों को उत्‍तरभारत के हिन्‍दी भाषा भाषी अपरोक्षरूप से अपना असर डालने की स्‍थितिमें हैं। हालां
कि इनके किसीभी फोरम या संगठन की हिन्‍दी को लेकर तमिलों से कोई दरकार  नहीं हैं किन्‍तु हिन्‍दी इनकी कमजोरी है और इसी लिये चुनावी अभियान में हिन्‍दी शामिल हो चुकी है।राजनैतिक तौर पर भारत के पूर्व गवर्नर जनरल राजगोपालीचारी ने जरूर मद्रास सरकार के प्रमुख के तौर पर हिन्‍दी को अपनाये जाने की वकालत की थी किन्‍तु इसके बाद राजनैतिक दलों के अभियानों से हिन्‍दी बिल्‍कुल ही साफ ही रही।
उक जानकरी के अनुसार तमिल नाडू में बसे उत्‍तर भारतीयों से भी कहीं अधिक महत्‍वपूर्ण भूमिका उन तमिलों की है जो कि रोजी रोटी कमाने के लिये तीस –तीस साल से ज्‍यादा समय तक दिल्‍ली,मम्‍बई में रहे हैं।
सुर इन दिनों कुछ बदले बदले लग रहे हैं. वर्ष 1965 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने की पहल के खिलाफ तमिलनाडु में छात्रों की अगुवाई में काफी हिंसक प्रदर्शन हुए थे. जिसमें डीएमके ने बड़ी भूमिका निभाई थी. लेकिन हर बार चुनाव से पहले डीएमके के यहीं हिंदी-विरोधी सुर बदल जाते है. खैर बदले भी क्यों नहीं! आखिर तमिलनाडु में रह रहे करीब 8-10 लाख उत्तर भारत के प्रवासी लोगों को लुभाने का जो सवाल है और जब जब डीएमके तमिलनाडु के हिंदी हार्टलैंड इलाकों में पहुंचती है तो हिंदी-विरोधी सुर मानों हिंदी प्रेमी बन जाता है. इन दिनों वोटरों तक पहुँचने के लिए डीएमके हिंदी की सहायता लेता देख रहा है. हिंदी बेल्ट में ख़ास कर ऐसे कई पोस्टर्स मिलेंगे जहां डीएमके ने हिंदी में लोगों से अपील की है कि वे उनकी पार्टी को वोट करे. यहीं पोस्टर्स एआईएडीएमके के भी देखे जा सकते है.
डीएमके का एक ऐसा ही पोस्टर, हार्बर क्षेत्र जहां चेन्नई के अधिक हिंदी लोग रहते है, वहाँ वोट मांगते हुए. यहीं पोस्टर्स एआईएडीएमके के भी देखे जा सकते है.
दरअसल करीब पचास साल पहले तमिलनाडु में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन ने देश को हिल कर रख दिया था. इतना ही नहीं उस वक़्त गैर हिंदी राज्यों में हिंदी थोपे जाने की देश की सोच के साथ साथ दुनिया के देखने की नज़र भी बदल डाली. जिसके बाद देश को भाषा को लेकर अपनी नीति बदलनी पड़ी और अंग्रेजी को सहायक भाषा का दर्ज़ा देना पड़ा था।