--अलीगढ़ विवि के छात्र रहे गुलजार को श्रीनगर से दिल्ली पुलिस ने किया था गिरफ्तार आगरा: दहशत का खेल देश में शुरूआत होने के दौर में आगरा में भी प्रदेश के कई अन्य जनपदों के समान ही

(आतंकवादियों की नजर से महुफूज नहीं रहा आगरा।)
हुए सीरियल
ब्लास्ट को अंजाम दिये जाने के आरोपी गुलजार अहमद वानी को आगरा में अदालत ने बरी
कर दिया। उसके खिलाफ पुलिस अदालत में ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। एडीशनल सत्र न्यायधीश
(1) ने अपने विस्तृत आदेश में लिखा है कि अभियोन पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध दसे दोषी
साबित करने लायक हुए सीरियल
ब्लास्ट को अंजाम दिये जाने के आरोपी गुलजार अहमद वानी को आगरा में अदालत ने बरी
कर दिया। उसके खिलाफ पुलिस अदालत में ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। एडीशनल सत्र न्यायधीश
(1) ने अपने विस्तृत आदेश में लिखा है कि अभियोन पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध दसे दोषी
साबित करने लायक पुख्ता सुबूत पेश नहीं कर
सकी।दोष मुक्त रहा गुलजार अहमद वानी मूल रूप से कश्मीर का है और उसे श्रीनगर के पीपारकरी(टोपरकारी)
से पुलिस के द्वारा गिरु्तार कर दिल्ली पुलिस की स्पेशल क्राइम ब्रांच के द्वारा
गिरु्तार कर यू पी पुलिस के हवाले किया गया

था। केस ट्राइल में पुलिस ने जिसे सीरियल ब्लास्ट का मास्टर माइंड तो बताती रही किन्तु कोई ठोस सुबूत नहीं जुटा सकी।
साक्ष्यों के अभाव में 16 साल पुराने मामले में कश्मीरी गुलजार अहमद वानी को कोर्ट ने बरी कर दिया।
आगरा को हिला देने वाली धमाके की घटना का उसे मास्टर माइंड बताया गया था। वर्ष 2000
में आगरा, बारबंकी, कानपुर
और लखनऊ में एक साथ धमाके हुए थे। पकड़े गए सिमी के युवकों के बयान के आधार पर
गुलजार को अभियुक्त बनाया गया था। स्वतंत्रता
दिवस से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त 2000 को सदर
के सौदागर लाइन क्षेत्र की घनी बस्ती के एक घर में धमाका हुआ था। इस धमाके में तीन
युवक मारे गए थे। ट्रांजिस्टर बम फटा था। उस समय यह खुलासा किया गया था कि यह बम 15
अगस्त के कार्यक्रम में विस्फोट के लिए तैयार किया जा रहा था। इसी
दिन बाराबंकी में ट्रेन में धमाका हुआ था। इसमें 10 लोग मारे
गए थे। अगले दिन 15 अगस्त को लखनऊ में सहकारिता भवन के पास
और कानपुर में धमाका हुआ था।
उत्तर प्रदेश में हुईं
सिलसिलेवार वारदातों ने हर किसी को हिला दिया था। देशभर का खुफिया तंत्र सक्रिय हो
गया था। आगरा ब्लास्ट में अलीगढ़ मुस्लिम विवि के छात्र मोहम्मद मारुफ और अब्दुल
मुवीन की गिरफ्तारी हुई थी। पुलिस ने दावा किया था कि सिमी ने विस्फोट की योजना
तैयार की थी। लखनऊ पुलिस ने मोहम्मद मुवीन से पूछताछ के बाद सीरियल ब्लास्ट का
मास्टर माइंड गुलजार अहमद वानी को बनाया था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने
जुलाई 2001 में गुलजार अहमद वानी को गिरफ्तार किया
था। वर्तमान में वह लखनऊ जिला जेल की हाई सिक्योरिटी सेल में बंद है। उसे पेशी के
लिए लखनऊ से आगरा लाया जाता था।
सोमवार को सदर इलाके में
हुए धमाके के मामले में सुनवाई थी। लंबी बहस और साक्ष्यों के अवलोकन के बाद फैसला
सामने आया। इसमें कोर्ट ने गुलजार अहमद वानी को बरी कर दिया। पुलिस उसके खिलाफ कोई
पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं कर पाई। पुलिस के पास उसके खिलाफ सिर्फ उसका इकबालिया
बयान और मुवीन का बयान था, जिसे कोर्ट में कोई बल नहीं मिला। गुलजार
को क्लीनचिट ने एक बार पुलिस की कलई खोलकर सामने रख दी है। यह साफ हो गया है कि
गंभीर मामलों में पुलिस लचर पैरवी करती है।
गुलजार अहमद वानी मूलत: टोपरकरी श्रीनगर का निवासी है। उसका जन्म दो मार्च 1973 को हुआ था। पिता बिजली विभाग में कर्मचारी थे। धार्मिक शिक्षा के लिए उसे बारामूला स्थित दारा उलूम मदरसे में भेजा गया था। कुछ साल बाद वह शिक्षा के लिए आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में आया। बीए और एम की शिक्षा अलीगढ़ विवि से पूरी की। यहां उसकी मुलाकात फैयाज सैफुल्ला से हुई। वह पाकिस्तान का था। हिजबुल मुजाहिद्दीन का सदस्य था। छह साल बाद दोनों एक बार फिर मिले।
गुलजार अहमद वानी मूलत: टोपरकरी श्रीनगर का निवासी है। उसका जन्म दो मार्च 1973 को हुआ था। पिता बिजली विभाग में कर्मचारी थे। धार्मिक शिक्षा के लिए उसे बारामूला स्थित दारा उलूम मदरसे में भेजा गया था। कुछ साल बाद वह शिक्षा के लिए आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में आया। बीए और एम की शिक्षा अलीगढ़ विवि से पूरी की। यहां उसकी मुलाकात फैयाज सैफुल्ला से हुई। वह पाकिस्तान का था। हिजबुल मुजाहिद्दीन का सदस्य था। छह साल बाद दोनों एक बार फिर मिले।
फैयाज ने उसे अपने जाल
में फंसाया। अलीगढ़ में पीएचडी में गुलजार का रजिस्ट्रेशन करा दिया। उसने गुलजार को
अली मोहम्मद से मिलवाया। जो एलईडी बनाने में एक्सपर्ट था। लखनऊ पुलिस ने अपनी केस
डायरी में यह सब कुछ लिखा था। कहानी तो लंबी चौड़ी बनाई गई, मगर साक्ष्य पुख्ता नहीं जुटाए गए। इसका लाभ सुनवाई के दौरान गुलजार को
मिला।
सुबूत के अभाव में अदालतों
से आतंकवादी वारदातों में लिप्तों का छूटना कोई नई बात नहीं है।ज्यादातर मामलों में
पूरा समय दिये जाने के बावजूद पुलिस ठोस सुबूत नहीं पेश करपाती है,जबकि अभियुक्तों की ओर से प्रभावी कार्रवाही होती है।कश्मीर से जुडे मामलों
में कई स्वयं सेवी संगठन भी दिलचस्पी लेते हैं, प्रचलित विधिक
व्यवस्था के दायरे में आने से इनकी गतविधयों प्रत्यक्ष रूप से सरकारें इनके कामकाज
पर नजर रखने से ज्यादा कुछ भी नहीं करपातीं। इस ताजा निर्णित मामले में भी अंराज्यीय
एवं सुबूत न होने की स्थिति को दृष्टिगत अगर हाईकोर्ट में अपील की जायेगी तो उसके
लिये शासनस्तर से ही स्वीकृति लेनी होगी।