चार सितंबर को रोम में ‘कैनोनाइजेशन’ प्रक्रिया होगी संपन्न
नई
दिल्ली: संत और ईश्वरीय शक्ति से संपन्न महात्माओं की सूची में अब मदर टेरसा
का नाम
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| (युवा मदरटेरसा (बांये) अब 4सितम्बर को घोषित होंगी 'संत' |
और शामिल होने जा रहा है। वेटेकिन सिटी के द्वारा उन्हें इस उपाधी से सम्मानित
किये जाने का एलान किया है। आगामी चार सितंबर को रोम में एक सेरेमनी के
दौरान यह दर्जा दिया जाएगा। टेरेसा की मौत के बाद उनके दो चमत्कारों की वजह से
उन्हें संत माना गया है। जो कि इस उपाधी के हकदारी के लिये अनिवार्य होता है। 2003 में टेरेसा को धन्य (ब्लैज्ड) घोषित किया..
गया था। उनके नाम के साथ जुडे पहला चमत्कार वह था जिसमें में मदर ने मोनिका बेसरा नाम की बंगाली ट्राइबल महिला को पेट के ट्यूमर से मुक्ति दिलाई थी। 2003 में एक सेरेमनी के दौरान पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मदर के पहले चमत्कार को मान्यता देते हुए उन्हें धन्य (Beatification) घोषित किया था।जबकि दूसरा चमत्कार मदर टेरेसा का दूसरा चमत्कार ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित ब्राजील के एक व्यक्ति के इलाज से जुड़ा हुआ है। 2008 में यह शख्स मल्टीपल ब्रेन ट्यूमर से ठीक हो गया था।
गया था। उनके नाम के साथ जुडे पहला चमत्कार वह था जिसमें में मदर ने मोनिका बेसरा नाम की बंगाली ट्राइबल महिला को पेट के ट्यूमर से मुक्ति दिलाई थी। 2003 में एक सेरेमनी के दौरान पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मदर के पहले चमत्कार को मान्यता देते हुए उन्हें धन्य (Beatification) घोषित किया था।जबकि दूसरा चमत्कार मदर टेरेसा का दूसरा चमत्कार ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित ब्राजील के एक व्यक्ति के इलाज से जुड़ा हुआ है। 2008 में यह शख्स मल्टीपल ब्रेन ट्यूमर से ठीक हो गया था।
पहले
चमत्कार के साथ ही संत बनाए जाने की
प्रक्रिया का पहला चरण शुरू हो गया था। पहले चमत्कार पर करीब तीन लाख श्रद्धालुओं
ने रोम में टेरेसा को संत की उपाधि देने की मांग की थी।
जबकि
2015 में पोप
फ्रांसिस ने उनके दूसरे मेडिकल मिरेकल (चमत्कार) को मान्यता दे दी थी।
करुणा की ममतामयी प्रतिमूर्ति मानी जाती रहीं मदर टेरसा मूल रूप से अल्बानियाई माता पिता की संतान थीं ।मदर टेरेसा को दुनियाभर में उनके चैरिटी वर्क के लिए जाना जाता है। 87 साल की उम्र में 1997 में उनकी मौत हो गई।
- मदर ने अपनी पूरी
जिंदगी गरीबों की मदद में गुजारी। कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की नींव रखने
वाली टेरेसा ने यहां के स्लम्स में गरीबों की सेवा में जीवन बिताया।
1979
में
मदर को उनके काम के लिए नोबेल पीस प्राइज से भी नवाजा गया।
संत घोषित करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल एवं परीक्षण
व सत्यापनोंपर अधारित है।
संत घोषित करने की प्रक्रिया तीन फेज में पूरी होती है।
पहले फेज में, संबंधित महान व्यक्ति के
फॉलोअर्स लोकल बिशप के सामने उस शख्स की महानताओं और दैवीय गुणों को साबित करते
हैं। चर्च द्वारा चुने गए पॉस्च्युलेटर के जरिए उस शख्स के सबूतों
और जानकारियों के आधार पर पोजीशन पेपर तैयार होता है।
उसके
आधार पर पोप उस व्यक्ति को पूज्य (Venerable) की उपाधि
देते हैं।
दूसरे चरण के तहत पोप उसे धन्य (Blessed)
की उपाधि
देते हैं। धन्य का मतलब है कि वह शख्स स्वर्ग में है।
यदि कोई उसके नाम से प्रेयर
करता है तो उसकी सिक्युरिटी के लिए धन्य शख्स भगवान तक बात पहुंचाने की ताकत रखता
है। जबकि आखिरी फेज में रोमन कैथोलिक चर्च के सुप्रीम
लीडर यानी पोप के द्वारा संत (Saint) की उपाधि दी जाती है।
उल्लेखनीय है कि संत बनाए जाने की प्रॉसेस को कैनोनाइजेशन के नाम से जाना जाता है।
उल्लेखनीय है कि संत बनाए जाने की प्रॉसेस को कैनोनाइजेशन के नाम से जाना जाता है।
