18 अक्टूबर 2015

जुनून अंग्रेजी के पर्यायवाचि‍यों से मुक्ति ‍ दि‍लवाने का

--महात्‍मा गांधी को ‘एम जी’और सरोजनी नायडू को ‘एस एन’ बोलना अब बर्दाश्‍त नहीं :कपूर


आगरा,भारतीय नामों का अंग्रेजीकरण रोकने को एक व्‍यापक अभि‍यान चलाये जाने की जरूरत हैयह मानना है वि‍कलांगों की सेवा के लि‍ये ताज सि‍टी में खास पहचान रखने वाले श्री वि‍ष्‍णु कपूर का।अपने कि‍स्‍म का वि‍शि‍ष्‍ट चलाने वाले श्री कपूर को अगर सबसे ज्‍यादा वेदना है तो ताज सि‍टी की लाइफ लाइन माने जाने वाली महात्‍मा गांधी रोड को एम जी रोड के कहने के प्रचलन से।उनका कहना है कि‍ मेरी अपेक्षा यह कभी नहीं रही कि‍ लोग ‘मोहनदास करम चन्‍द गांधी’ यानि‍ गांधी जी का पूरा नाम ले कि‍न्‍तु वि‍शुद्ध हि‍न्‍दी भाषी क्षेत्र के आगरा जैसे शहर में ‘एम जी  रोड’ कहलवाना भी कर्णप्रि‍य नहीं लगता।
सरदार पटेल के जन्‍म शतीवर्ष में उनकी स्‍मृति‍यों के संरक्षण को बनायी गयी ‘लोहा संकल्‍प समि‍त ‘के माध्‍यम से
अपने इस अभि‍यान को अंजाम दि‍ये जाने को कृति‍ संकल्‍पि‍त हैं। उन्‍हें उस समय भारी वेदना होती है जबकि‍ लोग आगरा के मुख्‍य अस्‍पताल और एक मात्र मैडीकल कॉलेज सरोजनी नायडू मैडीकल कालेज को ‘एस एन ‘ कह कर पुकारते हैं।उनका कहना है कि‍ नयी पीढी में से अनेक को तो यह भी नहीं मालूम कि‍ ‘एस एन ‘ का मतलब भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम की उस महान हस्‍ती से है,जो आजादी के लि‍ये चले संघर्ष के दौर में अपने साहि‍त्‍य काव्‍य के प्रेम और कंठ की माधुर्यता के लि‍ये वि‍शि‍ष्‍ट पहचान रखती थीं।अब तो शायद ही कुछ को ध्‍यान हो कि‍ प्रख्‍यात रचना ‘द गोल्‍डन थ्रेशहोल्‍ड ‘ रवीन्‍द्र नाथ टैगोर की ‘गीतांजली’ से आठ साल पूर्व ही अंतर्राष्‍्रीय ख्‍याति‍ प्राप्‍त कर चुकी थी।श्री कपूर का कहना है कि‍ लोग यह भले ही नहीं जाने की इसी महि‍ला की बदौलत भारतीय महि‍लाओं को बोट देने और चुनाव में खडे होने के अधि‍कार की बात शुरू हुयी और अंजाम तक पहुंची कि‍न्‍तु इतना तो जरूर जाने के एस एन का मतलब उन्‍हीं स्‍व श्रीमती सरोजनी नायडू से है,जो उनके प्रांत यू पी की पहली महि‍ला गर्वनर रही थीं।

 श्री कपूर हाल में ही मुम्‍बई गये थे और वहां गुरु तेग बहादुर के नाम के नाम पर बने हुए स्‍टेशनों और स्‍थानों को ‘जी टी बी ‘तथा छत्रपति‍ शि‍वाजी के नाम पर बने रेलवे टर्मि‍नल को ‘सी एस टी’ के रूप में प्रचारि‍त होने का वि‍रोध करके आये। रेलवे टर्मि‍नल के बारे में तो जि‍न लोगों से उन्‍होंने बात करने की कोशि‍श मुम्‍बई में की उन्‍हों ने खास तव्‍वजोह नहीं दी कि‍न्‍तु ‘जी टी बी’ के मामले में जरूर संबधि‍तों ने गंभीरता दि‍खायी।मुम्‍बई के एक स्‍थानीय गुरुद्वारे में न केवल उन्‍हें चर्चा के लि‍ये आमत्रि‍त कि‍या गया बल्‍कि‍ सैकडों लोगों ने उनके समक्ष संकल्‍प लि‍या कि‍ वह आगे से ‘जीटी बी’ और सी एस टी’ के एब्रीवेशनों का उपयोग न कर महापुरुषों के नाम से नाम से ही पुकारेंगे।
वैसे श्री कपूर के एजेंडे में काफी सारे नामों को लोगो का याद करवा के वर्तमान में प्रचलि‍त ‘अंग्रेजी एब्रीवेशनों’ को बोलचाल में इस्‍तेमाल करने की  आदत से छुटकारा दि‍लवाना है कि‍न्‍तु उनमें भी जो मुख्‍य हैं उनमें तात्‍या टोपें के स्‍थान पर ‘टी टी’,तीर्थकर महावीर दि‍गम्‍बर जी को ‘एम डी’ मुख्‍य हैं।
श्री कपूर ने अभी अपने अभि‍यान में ‘आगरा’ को ‘सि‍टी आफ ताज’ और आगरा के नागरि‍कों को ‘आग्राइटस’ कहने के बढते प्रचलन पर खुल कर कुछ नहीं कहा है कि‍न्‍तु उन्‍हे ये दोनों ही अंग्‍लभाषा-भाषि‍यों  के अनुकूलता वाले उच्‍चारण सख्‍त ना पसंद हैं।वे चाहते हैं कि‍ स्‍थानीय जनजीवन प्रचलन बढे इससे पहले ही इनके इस्‍तेमाल पर रोकटोक शुरू हो जाये।

श्री कपूर ने बताया कि‍ तीन साल पहले उन्‍हों ने यह मुहि‍म अकेले शुरू की थी कि‍न्‍तु अब तो काफी लोगों को यह अपील कर चुकी है।सोशल मीडि‍या का उपयोग कर इसे और तेजी के साथ प्रचारि‍त करेंगे।