--बादशाह भले ही समाप्त हो गये किन्तु बरकरार है शाही ईमाम का रुतबा --नौ वें ईमाम ने 1837 में पहनाया था दिल्ली के आखिरी बादशाह को ताज
आगरा, शाही ईमाम सैयद अहमद बुखारी
ने अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र सैयद शबन बुखारी को नायब ईमाम को घोषित करने का निर्णय कर लिया है और इसकी
औपचारिक्ता के लिये 22 नवम्बर को आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिये नरेन्द्र
मोदी को निमत्रित न किये जाने को लेकर
खुद शाही ईमाम और आयोजन सुर्खियों में हैं।
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| सैयद शबन बुखारी |
शाही ईमाम पद शाहजहां के समय से
शुरू हुआ था मौजूदा ईमाम सैयद अब्दुल्ला बुखरी 13 वें ईमाम हैं ,जबकि नये नायब ईमाम
शाहबन बुखारी जब भी वह ईमामत कार्यालय का कार्यभार ग्रहण करेंगे 14वें होंगे। 19
वर्षीय शबन बेहद शांत मिजाज के व्यक्ति हैं, जो नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी ऑनर्स के छात्र हैं।
वर्षीय शबन बेहद शांत मिजाज के व्यक्ति हैं, जो नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी ऑनर्स के छात्र हैं।
सैयद गफूर शाह बुखारी थे पहले शाही
ईमाम
दिल्ली के पहले शाही ईमाम सैयद
गफूर शाह बुखारी बने थे,जबकि इसके बाद शुरु हुऐ क्रम में सैयद अहमद बुखारी 13 वें
शाही इमाम हैं।.शाही
ईमाम को मुगल बादशाहों की ताजपोशी करने का सम्मान मिलता रहा है।औरंगजेब के
बादशाह घोषित होने पर ताजपहनाने का काम पहले ईमाम सैयद अब्दुल गफ्फार बुखारी को
ताज पहनाने के बाद यह परंपरा शुरू हुई और बहादुरशाह जफर की 30 सितम्बर 1837 को
नौ वं इमाम मीर अहमद अली शाह बुखारी के द्वारा ताजपोशी होने तक यह जारी रही।यह बात
अलग है कि इस शाही रस्म में ईमामों की इच्छा अभिव्यक्ति का कोई महत्व नहीं
रहा।अन्यथा शाहजहां के द्वारा नियुक्त ईमाम उनके उस पुत्र की ताजपोशी सहज नहीं
करता जिसने कि उन्हे आगरा किले में कैद कर रखा था।
एक ओर शाहजहां के काल से दिल्ली
के शाही तख्त पर बैठने वालो के ताजपहनाने की रस्म शाही ईमाम करते थे वहीं दूसरी
ओर शाही ईमाम का खिताब बादशाह का दिया हुआ है।
जब दिलली की जामा मस्जिद बनकर तैयार हो गयी
तो शाहजहां ने सोचा कि इस अतुलनिया मस्जिद का ईमाम भी सामान्य न होकर ईस्लाम
का विद्ववान एव अन्यो में श्रेष्ठ होना चाहिये।इस पर बादशाह की अंख बुखारा(उज्बेकिस्तान) की ओर गयी जो कि उस समय कला,ईस्लम की शिक्षा
एवं संस्कृति का मुख् केन्द्र बना हुआ था।शाहजहां ने बुखारा के बादशाह को एक
पत्रलिखकर अपेक्षा की कि उनकी इच्छा है िकि जामामस्जिद का ईमाम किसी ऐसे व्यक्ति
को बनाया जाये जन्म के आधार पर पैगम्बर मौहम्मद के वंश का हो तथा उच्च अध्ययन
किा हुआ हो।.24जुलाई 1656 को इसमें पहली नमाज शाही इमाम के नेतृत्व
में अता की।इसके बाद बादशाह ने उन्हें शाही उत्तरीय (रॉब) और पटटा भेंट कर
वाकादा ईमामत ऐ उज्म का प्रभार सौंप कर
शाही इमाम घोषित कर दिया।अब न तो बुखारा में ही बादशाहत बची है अैर नहीं
उस दिल्ली में जहां का शाही ईमाम बनाये जाने का
उन्हें लाया गया था।
आगरा का सम्बन्ध
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| फतेहपुर सीकरी की शाही जमामस्जिद(आगरा) |
आगरा
मे दो जामामस्जिदें है, इनमें पुरानी और पहली फतेहपुरसीकरी की जामामस्जद है । जिसे अकबर के शानकाल में 1571बनाया गया था और बुलंद दरवाजा से होकर इसकी पहुंच
है।वहीं दूसरी जामा मस्जिद शहर की शाही जामा मस्जिद है।
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शाही जामा मस्जिद ,आगरा
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इसका निर्माण शाहजहाँ की पुत्री, शाहजा़दी जहांआरा के द्वारा 1648 में करवाया गया था। शाही परंपरा की इन दोनों ही मस्जिदों का निर्माण दिल्ली की जामा जामामस्जिद के नि र्माण से पूर्व ही हो चुका था। |
हकीकत में आगरा की जामा मस्जिद को बनाने वालों में से ही अधिकांश ने दिल्ली की जामा मस्जिद के बनाने के लिये काम किया था। |



