--लुटियन जोन के कांट्रैक्टर
अमीर बख्श ने बनवाया था 1914 में
--इंग्लैंड की शोधार्थी कर
रही है फेस लिफ्टिग का प्रयास
आगरा,होटल कल्चर ताजगंज
में पहुंचने से कही पूर्व मेहमान नवाजी के लिये ताजमहल के आसपास के क्षेत्र में बाहर
से आने वाले गैस्टों के बीच एक जाना पहाचाना नाम था बिल्लोच पुरा स्थित अमीर
बख्श के ‘गैट हाऊस’ का। 1914 में बना इसका भवन कई दशकों तक अपनी खास पहचान को नजरअंदाज किये
जाने के दौर के बाद एक बार पुन:महत्वपूर्ण हो गया है। लंदन की मैट्रोपोलेटिन
यूनीवर्स्टी की छात्रा इसे अपने ‘स्टैडी प्रोजेक्ट‘ में शामिल किया हुआ है।पी
एच डी करने के साथ ही...
यूनीवर्स्टी के स्कूल आफ आर्कीटैक्चर से पी एच डी कर रही सुश्रीरचेल
ओ ग्रेडी आर्केलाजी में एम ए हैं अैर स्कूल
आफ आर्कीटैक्चर से पी एच डी कर रही हैं। उनके इस प्रयास में सेटर फार
अर्बन एंड रीजनल एक्सीलेंस (क्योर) संगठन मुख्य सहयोगी है।
काफी आशान्वित हैं रिचेल
उन्होंने ‘कालोनियल’ टाइम के जिस स्ट्रैक्चर को
सुधार कर उसमें रहने वालों के लिये रोजी रोटी का माध्यम भी बनाये जाने के प्रयास शुरू किये हैं,उसमें उन्हेने
पूरी कामयाबी मिलना तय मानी हुई है। कोशिशों को कामयाबी मिलने का सबसे बडा
सकारात्मक कारण इसका उस स्लम एरिये में होना है जिसके सुधार को भारत सरकार और
आगरा नगर निगम कार्यक्रम शुरू किये हुए हैं।
एक अन्य आशाजनक बजह यह है कि प्रोजेक्ट के पूरा होने
पर इसका सीधा लाभ उस परिवार को ही मिलना है जो वास्तव में इसका ओनर भी है और
वर्तमान में इसी में रह भी रहा है।यही नहीं इस परिवार के मौजूदा मुखिया सलीम बख्श
को अपनी पैत्रिक परंपरा से भन निर्माण कला की जानकारी है और खुद भी काम करने को
तत्पर रहते है। उल्लेखीय हे कि ताजगंज की 17 मलिन बस्तियों में से भारत
सरकार के मलिन बस्ती उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जिन 15 की आवासीय एवं नागरिक
सुविधाओं को अपग्रेडिड किया जा रहा है उनमें बिल्लोचपुरा भी शामिल है।
तब ताजगंज में नहीं था होटल
कल्चर
सुधार कार्यक्रम के तहत
1914 में बने इस गैस्ट हाऊस के भवन का
सुधार,मुख्य है।हैरीटेज क्षेत्र में होने से इसके लिये अनुमतियों की एक व्यवस्था
है जिसके तहत प्रयास शुरू हो चुका है।कई बार इस प्रोजेक्ट की उपयोगिता के बारे
में भी पूछा गया है जिस पर रचेल का केवल यही कहना होता है कि हैरीटेज क्षेत्र
में होने के अलावा बिल्डिग का खुद भी हैरीटेज श्रेणी का होना ही अपने आप में
पर्याप्त है। जहां आकर बैठना,कैटीन हों तो खाना और रहने का इंतजाम हो तो रात बितना
पर्यटक पसंद करेंगे।
मस्जद कमेटी है सहयोगी
प्रोजेक्ट के तहत रचेल ने
इस बस्ती से समबन्धित पुरानी किवदंतियां और कहानियां नुमा बृत्तंत संग्रहित
करना शुरू किया हुआ है।संभवत- आगरा का यह पहला शोधपरक प्रोजेक्ट है जसमें बस्ती
की मस्जिद कमेटी को सक्रिय भागीदार बनाया हुआ है।ताजगंज के युवाओं में गाइड
बनने की प्रवृत्ति शुरू से ही होती है,प्रोजेक्ट के तहत इनकी इस बृत्ति को
उभारकर टूरगाइड के रूप में तैयार करने का काम भी तेजी के साथ किया जा रहा है।
श्ाहीदे आजम के विरूद्ध गवाही देने वाले शोभा संह के थे कट्टर विरोधी 'अमीर बख्श'
बिल्डिंग को लेकर साक्ष्यों के आधार पर जो तथ्य
सामने आये हैं उनके अनुसार इस भवन के स्वामी अमीर बख्श संसद भवन और लुटिन जोन
के अन्य भवनों के निर्माण के कार्य में ठेकेदार के रूप में सक्रिय थे।प्रख्यात
लेखक खुशवंत सिह के पिता शोभा सिह जो इस प्रोजेक्ट के बडे ठेकेदारों में से थे
के नजदीकी थे। किन्तु उनकी यह नजदीकी एक ‘समय सीमा’ के बाद उस समय एक दम टूट गयी
जब कि सेंट्रल एसेम्बली बम कांड में शोभा सिह शहीदे आजम भगत सिह और बटुकेश्वर
दत्त के विरुद्ध गवाह के रूप में अंग्रेजो के पक्ष में अदालत में जा पहुंचे थे। क्षुब्ध
अमीर बख्श दिल्ली छोड आये और आगरा में ही रहने लगे। दिल्ली में काफी पैसा और
नाम कमाने के कारण उनका रसूखात बहुत ज्यादा हो गया था।अक्सर दिल्ली से उनके घर
मेहमानों का अना जान बना रहता। फलस्वरूप उनकी हवेली वाकादा गैस्ट हाऊस ही होकर
रह गयी थी।टम टम,मोटरों का अना जाना लगा रहाता था। सुरक्षित और सुविधाजनक आवास के
साथ ही ताजमहल से इसकी निकटता से अवाजाही लगतार बढती ही गयी। इसी बीच 1947 का दौर
आया जबकि देश के कई भागों की तरह ही ताजगंज मे भी तनाव की स्थिति बनी। कई परिवार
पाकिसतान भी गये थे किन्तु जो नहीं गये वह भी अपनी सुरक्षा के लिये ताजगंज छोड
गये थे।
अब तक जारी है एक बार शुरू हुआ उपेक्षा का दौर
अपनी गैर मौजूदगी के दौर में रखाली के लिये जायदाद नौकरों या उमिलने
वालों को सौंप दी। लगभग 20 साल के अंतराल
के बाद ही बख्श परिवार आगरा आ सका था। इस बीच काफी कुछ बदलचुका था। रसूख का
रुतबा दफा हो चुका था माया तो आनी जानी
होती ही है, आयी उछल कूद कर थी चली गयी एक ही छलांग में ।
गोथिक शैली के खम्बों और
महराबों से सजी इस इमारत में भी मेटीनेंस के न होने से क्षरण होता गया। पीछले दो
दशकों में तो भवन की वाह्य दृष्यता भी अन्य सामान्य इमारतों में खो गयी।बची रह
गयी तो वे चार खम्बों हित कुछ ‘आर्चें ‘ ही है जो कि लुटिन जोन की इमारतों के ‘आऊटर
लुक’ को भव्यता प्रदान करते हैं। इमारत के जीर्णोद्धार के लिये मंडलायुक्त को
नोडल अधिकारी के रूप में अर्जी दी जा चुकी है1जिस पर कार्रवाही भी शुरू हो चुकी
है किन्तु जब अनुमति जारी हो जायेगी तभी ईंट-गारे का काम शुरू हो सकेगा।
क्योर को उम्मीदें
सेटर फार अर्बन एंड रीजनल एक्सीलेंस (क्योर)
के प्रोजेक्ट अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि यह भवन ताजगंज के हैरीटेज वाक
में पडता है साथ ही दीवनजी बेगम की मस्जिद के एक दम सामने है।
उन्होंने कहा कि तजगंज
क्षेत्र में राजीव आवास योजना, मलिन बस्ती सुधार योजना के तहत बिल्लोचपुरा
मौहल्ले की मौजूदा स्थिति में काफी सुधार आना अनुमानित है।हेवेली गैस्ट हाऊस
एक बार अगर टूरिस्ट मैप पर आवासीय उपयोग की हैरीटेज प्रोपर्टी में शामिल हो गयी
तो इसमें आकर टिकने वालों का क्रम साल भर लगा रहा करेगा। ‘क्योर’ की एक सीमित
नानकामर्शियल सपोर्ट की ही भूमिका है और उसी को एक एन जी ओ के रूप में अंजाम
देने का प्रास कर रहे हैं।वैसे मस्जिद सहित दीवानजी बेगम से जुडे अन्य निर्माण भी अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं
हैं। आखिरकार अपने समय में उनका जलवा था और वह उस मुमताज बेगम की मां थीं जो मुगल
साम्राज्य शाहजहां के ताजिदगी राज्य करती रही।
ताज बनाने वाले ही नहीं संसद बनाने वालों का भी घर हे ताजमहल
अमीर बख्श के नाम का उल्लेख
सबसे पहले अब्दुल रहीम खां डिप्टा से सुना था।सोशलिस्ट नेता थे नगर निगम के
पार्षद भी रहे थे।वह उनकारीगर परिवारों में से थे जिनके वंशजों ने तजमहल बनाया
था ।तजमहल की संगमरमर की सफेदी और चमक बरकरार रखने के हर्बल फार्मूलें के जानकार
थे जिसमें फालसे का उपयोग होता है। एक बार चर्चा में स्व डिप्टा ने कहा था ताजगंज
में केवल ताजमहल बनाने वाले ही नहीं रहते संसद बनाने वाले भी रहते हैं।यहां के
लोगों ने दिल्ली का किला बनाने में भी योगदान दिया है।यह हुनरबन्दो की बसाबट
है।इसी परिप्रेक्ष्य में अमीर बख्श का भी उल्लेख आया इसी चर्चा में उन्होंने
बताय था कि किस प्रकार अग्रेज ठेकेदारों का सरकारी गैर बाजिब कामों के लिये भी
उपयोग करने के आदि हो चुके थे।उस समय की शोभासिह जैसी हस्ती तक को भगत सिह के
खिलाफ गवाही देने को विवश होना पडा था। इसे उनके निकट जिन लोगो ने पसंद नहीं
किया उनमें ताजगंज के अमीर बख्श भी थे।यही नहीं गवाही देने के फैसले से क्षुब्ध
अमीर साहब ने अपने आर्थिक हित नजर अंदाज कर उनसे कारोबार का रिश्ता तक ख्त्म
कर दिया।स्व डिप्टा के द्वारा 25 साल पूर्व की गयी यह चर्चा उस समय निरुद्धेश्य
लगी थी किन्तु जब मंगलवार को बिल्लोचपुरा में उनके गैसट हाऊस पर पुरानी वस्तुओं
की प्रदर्शनी में फोटुओ को देख रहा था तो अनायास ही इस भूली बिसरी चर्चा की एक एक
बात मनमस्तिश्क पर रिकाल होने लगी।
