-- नेताओं के द्वारा भुला दिये जाने के बावजूद फिर चले एक जुटता जुटाने
--अब अजित ने 12 तुगलक रोड के लिये एक बार फिर याद किया है
उठाये गये मुद्दे में स्मारक को
बनवाया जाना तो किसानों के नाम पर ही है यह बात अलग है कि अगर संघर्ष के बाद किसी
प्रकार इस प्रकार के प्रतिष्ठान आस्तित्व में आभी जाते हैं तो उन लोगों की
भागीदारी प्रतीकात्मक भी मुश्किल सह से ही रहजाती है जिनका इन्हें बनवाने में
जमीनी योगदान होता है।
वैसे अब तक किसान अपने को ठगा ही
महसूस करता रहा है खास कर उन नेताओ की सरकारों में जिन्हे बनवाने में उसके
जनाधार का ही भरपूर उपयोग हुआ।
लखनऊ में नहीं है किसान भवन
उत्तर प्रदेश को ही लें ,दिल्ली
में किसान को अपने घर के लिये संघर्ष को प्ररित करने वाले लखनऊ में कोई एसा स्थान
नहीं दे पाये जहां कि किसान राजधानी पहुंच कर केवल अपने पहचान पत्र के आधार पर सम्मान
सहित रह सके।अपवाद स्वरूप गन्ना भवन,एवं सहकारिता विभाग के कुछ इंतजाम हैं किन्तु
किसानों के नाम पर यह सुविधा सर्वथा अप्रचारित और कौपरेटिव सैक्टर के भी कुछ
ही लागों तक ही सीमित है।
चंडीगढ में है पुरानी किसानों के
ठहरने की पुरानी व्यवस्था
वैसे किसानो को सबसे आदर्श ठहरने की
व्यवस्था चंडीगढ के किसान भवन में तीन दशक पहले तक थी।केरल और महाराष्ट्र के
जनपदो में भी किसानों को ठहरने के समुचित ठिकाने हैं।
आगरा में अब तक नहीं बन सका किसान
भवन
आगरा मंडल के जनपदों में केवल डैम्पिर
नगर स्थित किसान भवन ही एक जना पहचाना स्थान है।आगरा में किसान भव की बाते तो
बहुत हुई किन्तु अब तक बन नहीं सका।पहले डिस्ट्रक्ट कौपरेटिव बैंक ,फिर डिट्रक्ट
कौपरेटिव फैडरेश और इसके बाद किसान भवन के इंतजाम की जिम्मेदारी मंडी समिति
की है।किन्तु किी के स्तर से भी कोयी प्रगति नहीं हो सकी ।मंडी समिति ने
कोई कमरा शायद फलसब्जी मंडी में चिन्हित भी कर दिया हे पर इसकी जानकारी सचिव
सब्जी मंडी को ही होगी।
चौधरी चरण सिह के नाम पर किसान
राजनीति से परे आस्था रखते हैं।
1969 में किसानों ने दी थी 77लाख की थैली
चौधरी साहब की जिदगी का सबसे बडा
तूफानी वर्ष 1979 का रहा जब कि उन्हे उपप्रधानमंत्री पद से त्याग पत्र देने के
साथ ही प्रधानमंत्री बनने और पद से 24दिन बाद ही त्यागपत्र देने की स्थतियों
से जूझना पडा।इसी साल उनको देश के किसानों की ओर से 77वे जन्मदिवस के अवसर पर
77लाख की थैली भेंट की गयी थी।महान समाजवादी और डा राम मनोहर लोहिया के शिष्यों
में से सबसे सक्रिय स्व राजनारायन की इस थैली को भेंट करने के लिये इंडिया गेट
के ग्राऊंड पर इस रैली के आयोजित करने में सबसे अहम भूमिका थी।
पता नहीं क्या कर रहा है थैली का प्रबंधक ट्रस्ट
स्व चरण सिह ने इस थैली से एक पैसा
भी स्वयं न लेकर इसे किसानों के स्वाभिमान और स्वालम्बी बनाये जाने के
प्रयासों के लिये किसान ट्रस्ट का गठन कर सोप दिया।दिल्ली में किसान भवन
बनाया जाना भी धन संग्रह के घोषित उद्धेश्यों में शामिल था।बाद में विदेश से
लौटने पर श्री अजीत सिह इस ट्रस्ट में उपाध्यक्ष के तौर पर शामिल हो गये।उम्मीद
की जा रही थी कि ट्रस्ट अपने खर्च कोष से होने वाले ब्याज की आये तक ही सीमित
रखेगा साथ ही सुरक्षित कोष को बढाये जाने के प्रयास कर देश के किसानों के उपयोग
लायक सशक्त माध्यम का रूप दिया जायेगा। ट्रस्ट की ओर से असली भारत साप्ताहिक
समाचार पत्र जरूर कुछ साल तक प्रकाशित बाद में वह मासिक हो गया ।अब ट्रट की स्थ्िति
क्या है यह सीमित लोगों को ही मालूम होगी कम से कम उस आम किसान को नहीं मालूम जिसकी
पूर्व पीढी के पिता,चाचा और दादाओं ने एक एक दो दो रूपये का योगदान देकर इस राश
को एकत्र करने में योगदान दिया था।जो भी हो पैंतीस साल पहले एक साफ सुथरी छवि
वाले नेता के नाम पर 77लाख एकत्र करना एक बडा लक्ष्य था।अब तो राजनेता करोडों भी
आसानी से जुटालेते हैं। 