17 सितंबर 2014

ति‍ब्बत की आजादी मुद्दे को याद दि‍लाया

भारत से स्‍वायत्‍ता और अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की स्‍वतंत्रता  सीख कर जायें चीनी राष्‍ट्रपति‍


          
आगरा,भारत के लोकतंत्र की बुनि‍याद की मजबूती यहां के नागरि‍कों को मि‍ली हुई अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की स्‍वतंत्रता और प्रांतो को स्‍वायत्‍ता है,न कि‍ चीन की तरह दमन और उत्‍पीडन यह कहना है ति‍ब्‍बत नि‍र्वासि‍त सरकार प्रधानमंत्री लोबसांग सागाय का।चीन के राष्‍ट्रपति‍ की तीन दि‍वसीय भारत यात्रा शुरू होने की पूर्व वेला में अपनी सरकार के धर्मशाला स्‍थि‍त मुख्‍यालय जारी वक्‍तव्‍य में कहा है कि‍ अब वक्‍त बदला है चीन को भी वास्‍तवि‍कता से रू ब रू होना ही चाहि‍ये।चीनी राष्‍ट्रपति‍ शी जि‍नपिंग के समक्ष ति‍ब्‍बत का मला उठाये जाने की अपेक्षा भी ति‍बती प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से की।निर्वासि‍त सरकार के द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त ति‍ब्‍बती महि‍लाओं के संगठन ‘ति‍ब्‍बतन वीमेंस एसोसि‍येशन’ की ओर से  अध्रयक्ष टी डोलमा ने भी भारत सरकार से ति‍ब्‍बत के स्‍वतंत्र आस्‍ति‍त्‍व को मान्‍यता दि‍लवाने के मामले मजबूती दि‍ये जाने की अपेक्षा की है।

                             ताज सि‍टी हमेशा रहा है ति‍ब्‍बति‍यो के साथ 
आगरा में ति‍ब्‍बत की स्‍वतंत्रता आदोलन को शुरू से ही भारी समर्थन रहा है।ति‍ब्‍बति‍यों के धर्मगुरू कई बार आगरा आ चुके हैं।बौद्ध वि‍हार चक्‍कीपाट के प्रांगड में ‘ति‍ब्‍बत की आजादी की मांग’ वि‍शय पर सेमीनार भी हो चुके है।बौद्ध धर्मालम्‍बि‍यों में खास सम्‍मान रखने वाले धर्माचार्य भंते कौडन्‍य जीवन पर्यंत ति‍ब्‍बति‍यों आंदोलन के प्रति‍ एकजुटता जताते रहे थे।एक बार उच्‍चस्‍तरीय चीनी शि‍ष्‍टमंडल का आगरा में उस समय प्रबल वि‍रोध हुआ था,जब कि‍ वह ताजमहल देखने आया हुआ था।तत्‍कालीन मेयर स्‍व रमेश कांत लवानि‍यां मेहमानों के स्‍वागत शि‍ष्‍टाचार के बाद खुलकर ति‍ब्‍बति‍यों की हि‍मायत कर पुलि‍स को बल प्रयोग से रोकने का प्रयास कि‍या था।
 
भारत का गि‍फ्ट है ‘नि‍र्वासि‍त सरकार
1950 में चीन की सरकार ने 17सूत्रीय समझौता ति‍ब्‍बत के शासन अध्‍यक्ष के रूप में 14वें दलाईलामा सेकि‍या थ।इसके तहत ही ति‍ब्‍बत का स्‍वतंत्र अस्‍ति‍त्‍व और चीन के बीच अंतरि‍म रि‍श्‍ते बने रहने थे। कि‍न्‍तु 1959 में ति‍ब्‍ति‍यों के द्वारा चीन में अपनी संस्‍कृति‍ और स्‍वतंत्रता के लि‍ये उठायी आबाज से चीन को बहाना मि‍ल गया और ड्रैगेन बौद्धों की स्‍वतंत्र सत्‍ता को लील गया।
( महि‍ला संगठन अध्‍यक्ष टी डोलमा)
पं जवाहर लाल नेहरू की ति‍ब्‍बत नीति‍ को लेकर अब तक जब तब आलोचना होती रहती है कि‍न्‍तु यह भूल जाते हे कि‍ सैनि‍क ताकत में कमजोरी और सीमा पर भरपूर पि‍टाई को सहने के बावजूद पहले प्रधानमंत्री ने ति‍ब्‍बत की आजादी की मांग को भारत का समर्थन जारी रखा।यही नहीं भारत भाग कर आये दलाईलामा को न केवल शरण दी अपि‍तु ति‍ब्‍बति‍यों को धर्मशाला (हि‍माचल प्रदेश)में निर्वासि‍त सकरार बनाये जाने की छूट भी दी। जो आज तक चीनि‍यों के लि‍ये सबसे बडा दर्द है।नेहरू की चीन नीति‍ को लेकर जब भी चर्चा होती हे तो इस तथ्‍य को भुला दि‍या जाता हे कि‍ सोवि‍यत संघ कैंप से तब भारत के रि‍श्‍ते नजदीकी नहीं थे वहीं वहीं गोवा से पुर्तगाल की सत्‍ता को मि‍लि‍ट्री आप्रेशन कर उखाड फेकने से अमेरि‍का बेहद नाराज था।तत्‍कालीन अमेरि‍कन राष्‍ट्रपति‍ जोह्न आफ कैनेडी तो गोवा कार्रवाही से इतने उत्‍तेजि‍त थे कि‍ नेहरू की आलाचना कर भारत को ही वि‍स्‍तारवादी बताने लगे थे।