आगरा( (Agra) : रायल इंडियन आर्मी की पांचवी लाइट इन्फेंट्री रैजीमेंट मद्रास से 1914 में सिगापुर को भेजी गयी थी ।इसे यार्कशायर लाइट इन्फेंट्री
का स्थान लेना था जिसे कि पश्चिम फ्रंट पर तैनात होने रवाना कर दिया गया था।इन्फ्रेंटी के पठान और
रजपूत सैनिकों ने अंग्रेजों का साथ देने के स्थान पर विद्रोह का रास्ता अपनाया और परिणाम
स्वरूप कोर्टमार्शल की कार्रवाही कर गोलियों
का समाना करना पडा।ये वे सैनिक थे जिनमें से बहुतो के पूर्वजों को प्रथम स्वतंत्रता
संग्राम (गदर) में अपनी जान गंवानी पडी थी।इन्हों ने अंग्रेज हुकूमत से विद्रोह
करने के साथ ही गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के द्वारा पहले विश्वयद्ध में
आंग्रेजो का साथ देने के निर्णय से भी असहमति जतायी थी।अंग्रेज इस विद्रोह से हिल
गये थे और उस समय यह घटना तमाम सैंसरशिप के प्रयासों के बावजूद दूसरी म्यूटनी के नाम से मशहूर हुई।इन बाहादुरों जिनमे
से ज्यादातर मुसलमान थे को विश्वयुद्ध की शताब्दी के मौके पर भुलाया हुआ है। न
भारत मे ही इन्हें याद किया गया और नहीं पाकिस्तान या बंगलादेश में
ही।अंग्रेजो के द्वारा तो याद किये जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।सिंगापुर पर अपने नियंत्रण के दौरान इनको पहली एवं अंतिम
बार शहीदों के रूप में इंडियान नेशनल आर्मी के सेनापति एवं आजाद
हिन्द के राष्ट्र अध्यक्ष सुभाश चन्द्र बोस ने जरूर श्रद्धाजली दी थी।
(अंग्रेज सैनिकों की बन्दूक की नालों के सामने खडे बहादुर विद्रही भारतीय,जो गोली चलाये जाते ही लाश के ढेर में तब्दील हो गये थे)
इन बाहादुरों, जिनमे से ज्यादातर मुसलमान थे को विश्वयुद्ध की शताब्दी के मौके पर भुलाया हुआ है।न भारत मे ही इन्हें याद किया गया और नहीं पाकिस्तान या बंगलादेश में ही।अंग्रेजो के द्वारा तो याद किये जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।इनको अंतिम बार राष्ट्रीय हीरो के रूप में इंडियान नेशनल आर्मी के अध्यक्ष एवं आजाद हिन्द के राष्ट्र अध्यक्ष के रूप में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जरूर श्रद्धाजली दी थी।
