June 5, 2017

आगरा में 25 सालों में न वायु प्रदूषण कम हुआ, न यमुना में जल प्रवाहित हो रहा है

आगरा। ताज टरपेजियम जोन में प्रदूषण सम्बन्धी एम् सी मेहता की (PIL ) पर डॉ वरदराजन समिति रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतहासिक फैसले की 25 वीं सालगृह पर आयोजित गोष्ठी में ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष  सुरेंद्र शर्मा ने पूछा  क्या आगरा ताज महल व् अन्य इमारतों के लिए प्रदूषण मुक्त हो चूका है. क्या आगरा में क्वालिटी ऑफ़ लाइफ में सुधार हुआ है, क्या आम आदमी को सुरक्षित हवा और पानी मिलने लगा है?
 होटल गोवेर्धन में आगरा की "स्टेट ऑफ़ एनवायरनमेंट रिपोर्ट" प्रस्तुत करते हुए ब्रज खंडेलवाल ने कहा २५ सालों में न वायु प्रदूषण कम हुआ है न यमुना में जल प्रवाहित हो रहा है जिस से प्रदूषण नियंत्रित हो सके. यमुना जहरीली हो गयी है, नालों को बंद नहीं किया गया है।  ग्रीन कवर जो राष्ट्रीय मानक के मुताबिक ३३ प्रतिशत होना चाहिए, घट कर आठ से नीचे चला गया है. ताज महल पर इंसानी दबाब नित बढ़ रहा है।  लगभग एक करोड़ लोग ताज महल देखने आते हैं. इनमें फ्री देखने वालों की संख्या शामिल है , मसलन बच्चे और भक्त ​.
​पिछले वर्षों में जितना भी सुधार पर्यावरण के क्षेत्र में हुआ उसको जीरो कर दिया वाहनों की बेहताशा बढ़ती संख्या ने।  इसके अलावा पिछले दस वर्षों में निर्माण कार्यों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है, कॉलोनीज , flyovers  फ्ल्योवेर्स, रिंग रोड, एक्सप्रेसवेज, सबने मिलकर हरियाली को शिकार किया है और डस्ट पार्टिकल्स (एसपीएम लेवल ) को मानकों से कई गुना ज्यादा बढ़ा दिया है , ब्रज खंडेलवाल ने बताया। 

 श्रवण कुमार सिंह ने कहा गन्दी के लेवल में कोई फ़र्क़ नहीं आया है, नाले और सीवर उफनते रहते हैं, खुले में शौच करने वालों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है व् रिवर पुलिस निकम्मी साबित हुई है.

गोष्ठी में चिंता व्यक्त की गयी की सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो आदेश दिए गए उनको अभी तक लागू नहीं किया गया है : धोभी घाट, यमुना किनारा रोड की ट्रांसपोर्ट कम्पनीज, पेठा उद्योग, जूते की फैक्ट्रीज, डेयरीज , शमशान घाट को आज तक शिफ्ट नहीं किया गया है।  फारेस्ट की जमीन पर अनधिकृत निर्माण जारी है।  मल्टिस्टोरिड बिल्डिंग्स बोरिंग के जरिये सीवर ज़मीन में उतार रहे हैं , इनमें होटल भी शामिल हैं , जहाँ सीवर कनेक्शंस नहीं हैं , लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई है। कुल मिलकर २५ साल बर्बाद हुए हैं, ये फैसला था गोष्ठी का।