जसबंत सिह आयोग की रिपोर्ट अब महज प्रेरणाप्रद साक्ष्य
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| अचल शर्मा 'भइय्ये' : फोटो:असलम सलीमी |
आगरा: इलहाबाद हाईकोर्ट की बैंच आगरा में स्थापित किये जाने की संभावनायें बहुत ही सीमित होकर रह गयी हैं किन्तु विद्यमान अब भी हैं, जो कि परिणामदायक भी साबित हो सकती हैं। बशर्त इसके लिये नवीनतम प्रयास तीन दशक पूर्व की उसी भावना अनुरूप, जन-आंदोलन के रूप में किये जायें जिनके परिणाम स्वरूप जसवंतसिह आयोग के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ था। यह कहना है ' भइय्ये' के अपने उपनाम से पहचान रखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता अचल कुमार शर्मा का है जो कि जींवंतता से भरपूर अपने जीवन के 2 अक्टूबर 2016 को सात दशक पूरे होने के उपलक्ष्य में स्वजनों द्वारा प्रकाशित होने जा रही स्मारिका ‘आओ स्मृतियां संजोयें’ के लिये एक साक्षात्कार दे रहे थे।
श्री शर्मा ने कहा कि अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया हो तो ‘जसवंत सिंह आयोग’ के गठन होने वाला चरण एक आंदोलन था जिसमें अधिवक्ताओं के अलावा आगरा के जनजीवन में सक्रियता रखने वाले वर्गो और संगठित समूहों के माध्यम से आम आदमी की भागीदारी थी। जबकि बाद का चरण उन हडतालों से भरपूर था जिससे पूर्व में सहयोगी की सक्रिय भूमिका निर्वाहन करने वालों के आर्थिक हितो पर भी प्रत्यक्ष असर पडा था।
श्री शर्मा का मानना है कि अगर कुछ पाना है तो हमें अपनी रणनीति बनाकर सक्रिय होना पडेगा ,मेरठ या किसी अन्य किसी स्थान पर होने वाली प्रतिक्रियओं को अनदेखा करना होगा।इसी प्रकार अन्य स्थानों पर कुछ होता है तो उसकेप्रति पूरी गंभरता रखने के बावजूद संयमित किन्तु सटीक प्रतिक्रिया तक ही अपने को सीमित रखना होगा। अगर जनता को अपने साथ एक बार फिर से खडा कर सके तो मुकाम तक पहुंचना मुश्किल भले ही हो चुका है किन्तु असंभव नहीं हैं।
श्री शर्मा बताते हैं कि 30अगस्त 1985 को जस्टिस जसबंत सिह के नेतृत्व वाले कमीशन की रिपोर्ट आयी थी, उस समय हालात अधिक अनुकूल थे , रिपोर्ट भी आगरा के माफिक ही थी किन्तु अब यह उपलब्धि ऐतिहासिक हो चुकी है।तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है, खासकर के राजनैतिक माहौल। चुनौतियों के दौर में भी राजनीति पालेबन्दी से अपने को ऊपर नहीं रख सकते।फिर भी जसबंत सिह रिपोर्ट को प्रेरणाप्रद साक्ष्य मानकर नई शुरूआत तो कर ही सकते हैं।
फिलहाल वह केवल उन स्मृतियों को ही ताजा करने तक ही अपने को सीमित रखते हुए बताते हैं कि किस प्रकार आगरा के अधिवक्ता ‘जनबल की ताकत से दिल्ली जा पहुंचे थे और पटियाला हाऊस कोर्ट से लेकर इंडिया गेट ,विजय चौक तक को गर्मा दिया था ‘खंड पीठ के मुद्दे से’ । कई सीनियर एडवोकेटों के साथ ही वह अपने पुराने साथी श्री भवतोष चक्रवर्ती का नाम लेना नहीं भूले जो कि दिल्ली के मीडिया ही नहीं राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति स्व जैल सिह तक से बेबाकी से ‘रू ब रू ‘ होने से नहीं रुक सके थे। वह बताते हैं कि स्व श्रीमती इन्दिरा गांधी से अकबर रोड स्थित प्रधानमंत्री आवास पर हुई मुलाकात कभी न भूलने वाली रही । उनका तो यह भी मानना है कि इसी मुलाकात के फलस्वरूप ही जसवंत सिह कमीशन का मार्ग प्रशस्त हुआ था।क्योकि स्व श्रीमती गांधी को जो फीडबैक तब तक मिलचुके थे उससे उन्हे अहसास हो गया था कि अब यह मामला टलने की स्थिति का नहीं रहा।
श्री शर्मा कहते हैं कि जस्टिस जसबंत सिह ने लगातार 25 दिन तक आगरा में रहकर जिस सौम्यता के साथ आगरा वासियों को सुना वह भी अपने आप में यादगार है। आदोलन के मुख्यकर्ता धर्ता अधिवक्तों ने खुद को भले ही पीछे रखा हो किन्तु जो भी ग्रुप आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने पहुंचा उसको मुलाकात किये बिना नही जाने दिया। वह कहते हैं कि आज भी जब हवाई अडडे या नये एक्सप्रेस मार्गों को बनाकर आगरा से संपर्क को अधिकतम त्वरित और सुलभ करने की कोशिश होती हैं तो उन्हे जस्टिस जसबंतसिह से नीजी वार्तालाप के दौरान कही यह बात याद आजाती है कि ‘आपके शहर में ताजमहल की मौजूदगी ही अपने आप में पर्याप्त कारण है जिससे यहां प्रदेश ही हीं देश के किसी भी भाग से आवागमन की सुविधायें हमेशा उच्चीक;त करते रहना सरकारों की मजबूरी रहेगी।
कल्याण योजनाओं को अधिक सार्थकता प्रद हों
श्री आचल शर्मा कहते हैं कि न्याय व्यवस्था के बारे में तो इच्छा या अनइच्छा होने पर भी सरकारों को सोचना ही पडेगा किन्तु न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्थंभ अधिवक्ताओं के बारे में भी अधिक उदारता के साथ सोचना चाहिये।प्रतिस्पर्धा हमारे पेशे की नियति है, जो कि कमोवेश अब तक स्वस्थ्य ही रही है किन्तु आने वाला समय और भी चुनौती भरा होगा। वह कहते हैं कि एक दशक पूर्व तक एक डेढ हजार ही सक्रिय अधिवक्ता हुआ करते थे किन्तु अब यह संख्या जनपद में बढकर लगभग सात हजार से ज्यादा पहुच चुकी है।यह बात नहीं कि सरकारों और बार काफंसिल ने अधिवक्ताओं के कल्याण के लिये कोई योजना नहीं बनायी हों किन्तु हकीकत यही है कि अधिवक्ताओं सुविधा और सामाजिक सुरक्षा कवर बहुत छोटा है।इसे प्रभावी और अधिक उपयुक्त करने के लिये व्यपक बहस होनी चाहिये। पेशें की गारिमा पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पडे इसके भी सक्रिय चिंतन चलते रहना चाहिये।
