--मन्कामेश्वर के महंत ने भी माना उपोगी वैकल्पिक इंधन
आगरा, हिन्दू अंत्येष्टी
परंपरा में पेड काटकर लाईजाने वाली लकडी का उपोग सीमित किया जा
![]() |
| मोक्ष काष्ठ:ताजमहल को अंत्येष्ठी जनित प्रदूषण से बचाने को सेबसे सशक्त वैज्ञानिक विकल्प। |
सकता है,,साथ ही अंति व्यय साध्य होती जा रही इस प्रक्रिया को कम खर्चीला भी किया
जा सकता है। ठेठ हिन्दूवादी मानसिकता बहुल क्षेत्र नागपुर सहित महाराष्ट्र के कई
अन्य जनपदों में पेड कटने से बचाने ओर हिन्दू पद्यति से अंत्येष्टी की परंपरा
को बरकरार रखने का कामम पेड से प्राप्त लकडी के स्थान पर फसल के बाद खेतों में
खडे रहजाने वाले कृषि अपशिष्ट( एग्रो वेस्ट) का उपयोग कर किया जा रहा है।
खडे रहजाने वाले कृषि अपशिष्ट( एग्रो वेस्ट) का उपयोग कर किया जा रहा है।
यह कहना है, नागपुर से आये
श्री विजय लिमये का जो कि शहीद स्मारक संजय प्लेस में आयोजित जनसंवाद को मुख्य
वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।उन्होंने
बताया कि ‘मोक्ष काष्ट’ यानि
परंगति दिलवाने वाली लकडी के नाम से
प्रचलित यह इंधन ‘ब्रिकविट’ जो कि
खेतों में अब तक किसानों के लिये अनुपयोगी और नष्टकर हटाने के लिये खर्चीले साबित
होतेरहे तिलहनीएवं दलहनी फसलों के ठूंठों से बनाया जाताहै। इसमें इन ठूंठों का
ग्राइंड किया गया चूरा और नीम की पत्ती, तुलसी आदि के सहज
उपलब्ध हो सकने वाले अपशिष्ट होते हैं। खेतों में गढे रहजाने वाले फसलों के ठूठ
ही इसका मुख्य आधार रॉमैटीरियल है।
श्री लिमये बताते हैं कि ठूठों को
नमीरहित सूखी लुगदी में बदल कर ,अन्य नीमव तुलसी आदि
पत्तियों के साथ समिश्रित कर छै इंच के बेलनाकार पिंडों में बदलने की पूरी
प्रक्रिया स्वचालित मशीनीकृत है। दो से ढाई लाख कीमत की यह मशीन सहजता के साथ
गांव के नजदीकीइलाकों में लगाई जा सकती है। कच्चा माल चूंकि कृरूाि उपज का ही भाग
है, इस लिये इसे गांवों केे आसपास ही लगाया जाता उपयुक्त
है।
वह बताते हैं कि एक मानव शरीर को ‘पंच तत्वों’ में विलीन करने के लिये केवल 150 किलो
मोक्ष काष्ठ जरूरी होती है,चिता बनाये जाने के बाद उसको ऊपर
से गोबर के चालीस किलो कंडे से ढांप दिया जाता है। अमूमन लकडी की चिता से अंत्येष्टी
में डेढ से दो घंटे का समय लगता है किन्तु नमी रहित इंधन के रूप में मोक्षकाष्ठ
की चिता शीघ्रता से प्रज्वलित हो जातीहै।फलस्वरूप पौन घंटे से भी कम समय में मृत
शरीर पंचतत्वों मे विलीनहा जाताहै।
श्री लिमये बताते हैं कि यह इंधन ‘ग्रीन फ्यूल ‘ की परिभाषा में आने से सरकार भी इसे
प्रचलित बनाना चाहती है, इसकी मशीन को लगाये जाने के लिये
अत्यंत सीमित ओपचारिक्तायें जरूरी है। महाराष्ट्र में तो मशीन लगाये जाने का स्थान
विद्युत ट्रांसफार्म रे दूर होने पर बिजली की लाइन देने का काम भी ग्रीनफ्यूल
प्रोत्साहन के तहत लेकर उदारता के साा कनैक्शन देने का काम किया जाता है। भारत
सरकार ने इसे वैट से मुक्त कियाहुआ है,अन्य प्रकार के करों
से भी इसके उत्पादकों को राहत है।
इस अवसर पर उपस्थित मन्कामेश्वर
मंन्दिर के महंत योगेश पुरी जी, ने मोक्ष काष्ठ
बनाने की प्रक्रिया, उसकेबनाये जाने में उपयोग किये जाने
वाले कृषि व अन्य वस्तुओं की जानकारी लेने के बाद कहा कि ाजो कुछ उन्हे बताया
गया है,वह सभी हिन्दू अंत्येष्ठी की प्रचलित पद्यति के
अनुकूल ही है,जिसका उपयोग कर अंतिम संकार विधान संपन्न किये
जाने के साथ ही पर्यावरण का आधार पेडों को कटने से बचाये जाने का काम भी संभव है।
शुरूआत में मोक्ष काष्ठ का उपयोग वैकल्पिक इंधन के तौर पर तो शुरू ही किया जा
सकताहै।
सेंटजोंस कॉलेज के इतिहास विभाग के
पूर्व अध्यक्ष डा आर सी शर्मा ने कहा कि पौराणिक बृतांतों में शरीर के पंचतत्वो
में विलीन करने के जो बृतांत मिलते हैं, मोक्ष काष्ठ
वर्णित इंधनों के समतुल्य ही नहीं उच्चीकृत ंधन है।महिला शांति सेनाकी अध्यक्ष
श्रीमती वत्सला प्रभाकर ने कहा कि साइंस और ईकोलाजी साइंस की जानकार होने के नाते
मोक्ष काष्ठ को धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही कसौटियों पर एक दमखरा मानती
है।श्री श्याम पैंगोरिया ने कहा कि क्षेत्र बजाजा कमेटी के अध्यक्ष एवं
मंडलायुक्त से मुलाकात करनी चाहिये। यही नहीं उन्होंने यह भी बताया कि मंडलायुक्त
के द्वारा पहल कर विद्युत शवदाह ग्रह के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिये इसका
उपयोग निशुल्क कर दिया गया है। गाजियाबाद के एक स्वैच्छिक संगठन को इसकी
कार्रवाही के संचालन की जिम्मेदारी दी गयी है। सीनियर जर्नलिस्ट एवं यमुना एक्टिविस्ट
श्री बृज खंडेलवाल ने कहा कि प्रिजेटेशन के आधार पर तो यह हरदृष्टि से उपयोगी ही
है , इससे आगे तो उपयोग के आधार पर परीक्षण से ही निष्कर्ष
प्राप्त हो सकता है।केनद्रीयसेव9ा के पूर्व अधिकारी श्री बृज किशोर शर्मा ने आम
जनता का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिये कोशिशशुरू किये जाने पर बल दिया वहीं
शहीद स्मारक समिति के महामंत्री राजवीर सिह राठौर ने कहा कि इस इंधन से मिलते
जुलते एग्रोबेस्ड इंधन का उपयोग कई और क्षेत्रो में पहले से ही हो रहा है। अत्येष्टी
जैसे कर्म में भी अगर अपनाया जाये तो व्यवहारिकही रहेगा।
सिविल सोसायटी आगरा के श्री अनिल
शर्मा श्री लिमये के आगराआगमन पर धन्यवाद व्यक्त किया और कार्यक्रमकी आरंभिक
कोशिशों में श्रेत्र बजाजा कमेटीके कुछ पदाधिकारियों का जो नकारात्मक रूख है,वह भी बदलेगा। श्री शर्मा ने कहा कि क्षेत्र बजाजा कमेटी के सैकेट्री को
वह प्रस्ताव के रूप में विचारा हेतु इसे प्रेषित करेंगे।
श्री लिमये जो कि नागपुर आधारित ‘’ईको फ्रेडली लिविंग फाऊंडेशन’ संगठन की ओर से सक्रिय
हो गीन फ्यूल का प्रचार कर रहे है ने कहा कि आगरा आकर उन्हे बेहद खुशी हुई, उम्मीद जताई कि आगरा के नौजवानों में से कुछ जरूर एग्रोबेस ईंधन को
बनाने की प्रक्रिया में सहभागी होंगे। पूर्व में श्री लिमये ताजगंज शमाशन घाट, शमशाबाद के कुछ गोवां में गये औरवहीं ईको फ्रेडली इंधन के उत्पादन के
लिये जरूरी रामैटीरियल की उपलब्धता की स्थिति का जायजा लिया।
