8 फ़रवरी 2016

तीर्थराज मचकुण्ड पर इक्या्वन जोडे बिवाह बधन मे बंधे

अरावली की सुरम्‍य घाटी मे स्‍थित मचकुन्‍द घाट जहां सजेथे51विवाह मंडप)

 बडी संख्‍या में आगरा से भी विवाह में शिरकत करने पहुंचे                         आगरा, कडक ठंड को विदा कर गुलाबी धूप की ओर अग्रसर हो रहा मौसम उन 51 नव दम्‍पत्‍तियों के लिये ताजिंदगी यादगार रहेगा जो रविवार 7 फरवरी को तीर्थराज मचकुन्‍द में पवित्र सरोवर केघाटोंपर विवाह बंधन में बंधे।  राजस्‍थान के सीमांत , आगरा की  दक्षिणी सीमा से लगे धौलपु

(सामूहिक विवाह कार्यक्रम के मुख्‍य मेजवान
श्री नारायणदास एवं उनके परिवारी जन)

र  जनपद में स्‍थित इस तीर्थस्‍थल पर संपन्‍न हुए इस सर्वधर्म सामूहिक विवाह कार्यक्रम में जहां चालीस जोडों ने वेदमंत्र के उच्‍चरणों के बीच अग्‍नि को साक्षी मान फेरे लिये,वहीं नौ जोडों ने इस्‍लाम की रीति रिवाजो के बीच विवाह बंधन कबूल किया। जबकि दो सिख जोडों ने पवित्र गुरुग्रंथ के समक्ष माथा टेक कर एक दूसरे को स्‍वीकरा। विवाह सूत्र में बंधे इन जोडों में सबसे ज्‍यादा राजस्‍थान के जनपदों की ही थी वैसे यू पी और म प्र से भी कई वर-वधु परिवारी जानों के साथ यहां पहुंचे थे।इस बृहद  स्‍तरीय कार्यक्रम को संपन्‍न करवाने का बीडा श्री नारायण दास एवं उनकी पत्‍नी श्रीमती लीला देवी के द्वारा ही उठाया गया था,परिवार के अनिल अग्रवाल, महेश अग्रवाल, श्‍याम अग्रवाल धीरज अग्रवाल,  श्री रामेन्‍द्र शर्मा आदि अपनी पत्‍नियो एवं बच्‍चो के साथ बतौर मेजवान अंतिम जोडे की विदाई तक मौजूद रहे।परिवार की ओर से सभी नव दंपत्‍तियो को सदभावियों के सहयोगियों से गृहस्‍थ जीवन के लिये जरूरी सामान के अलावा विदाई के समय मंगल कामनाओं के साथ एक एक आभूषण भी श्री अग्रवाल के द्वारा भेंट गया।                इस व्‍यवस्‍थित सामूहिक विवाह कार्यक्रम में भाग 

(समाजसेवीविष्‍ण्‍ूकपूर एवं विजय खंडेलवाल)

लेने के लिये हालांकि प्रत्‍येक जोडे के परिवार से पचास –पचास घराती बराती लाने केी अपेक्षा की थी किन्‍तु अधिकांश के साथ कही ज्‍यादा लोग आयोजन में सहभागी होने पहुंचे थे।इनके अलावा अग्रवाल परिवार के मित्रो के परिवार और स्‍वत: स्‍फूर्त से भी पहुंचने वालों की बडी संख्‍या थी।आगरा से विवाह कार्यक्रम पहुंचने वालों में मुख्‍य समाज सेवी श्री विष्‍णू कपूर ने कहा कि यहां आकर बेहद सकून मिला,ईश्‍वर से प्रार्थना है कि नव दंपत्‍तियों की जीवन खुशहाली भरा हो। उन्‍हों ने इंतजाम की खास तौर से तारीफ की।आगरा कॉलेज के वरिष्‍ठ प्रोफेसर डा विनोद कुमार महेश्‍वरी,दिनेश कुमार वर्मा सारथी सूर स्‍मारक मंडल की महामंत्री डा विजय लक्ष्‍मी शर्मा, विजय खण्डेलवाल एवं प्रदीप अग्रवाल आदि सहित सात हजार लोगों की भागीदारी रही।विवाह के बाद दोपहर के भाजन की व्‍यापक व्‍यवस्‍था की गयी । 

                              मुचकुन्‍ड

सामूहिक विवाह के इक्‍यावन मंडपों का साक्षी बना मुचकुनद (धौलपुर )तालव व इसके तटीय मन्‍दिर और समाधियां हिन्‍दू पौराणिक साहित्‍य में अत्‍यंत पवित्र स्‍थान माना गयाहै। इस स्‍थन का नाम का नाम राजा मुचुकुन्द के नाम पर पडा। जो कि  सूर्य वंशके 24वें राजा थे। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि राजा मुचुकुन्द यहां पर सो रहे थेउसी समय असुर कालयवन भगवान श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए यहां पहुंच गया और उसने कृष्ण के भ्रम मेंवरदान पाकर सोए हुए राजा मुचुकुन्द को जगा दिया। राजा मुचुकुन्द की नजर पड़ते ही कालयवन वहीं भस्म हो गया। तब से यह स्थान धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। इस स्थानके आस-पास ऐसी कई जगह है जिनका निर्माण या रूप परिवर्तन मुगल सम्राट अकबर ने करवाया था। मुचुकुन्द सरोवर को सभी तीर्थों का भान्जा कहा जाता है। मुचुकुन्द बहुत ही सुन्दर रमणीक  प्रकृतिकी गोद में धौलपुर के निकट ग्वालियर-आगरा मार्ग के बांई ओर लगभग दो कि०मी०की दूरी पर स्थित है। इस विशाल एवं गहरे जलाशय के चारों ओर वास्तु कला में बेजोड़ अनेक छोटे-बड़े मंदिर तथा पूजागृह पालराजाओं के काल 775 ई.से 915 ई.तक के बने हुए है। यहां प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल ऋषि-पञ्चमी और बलदेव-छट को विशाल मेला लगता है। जिसमें लाखों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैंइस सरोवर में स्नान कर तर्पण-क्रिया करते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि यहां लगातार सात रविवार स्नान करनेसे कान से सर का बहना बन्द हो जाता है। हर अमावस्या को हजारों तीर्थयात्री प्रातःकाल से ही मुचुकुन्द-तीर्थकी परिक्रमा लगाते हैं। इसी प्रकार हर पूर्णिमा को सायंकाल मुचुकुन्द-सरोवरकी महा-आरतीका आयोजन होताहैजिसमें सैकडों की तादाद में भक्त सम्मिलित होते हैं।