-- जहरीली बहस में इतिहास कम धार्मिक असहष्णुता को बढाने वाले तथ्य अधिक
आगरा:भारतीय जनता
पार्टी राष्ट्रीय महामंत्री महेश गिरी ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को
सुझाव दिया कि लुटियन जोन की ओरंगजेब रोड का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम पर रख कर उन्हें अधिक सम्मानित करने का काम किया जाये।दिल्ली म्यूनिस्पिल काऊंसिल ने मंगलवार को श्री गिरी की इच्छा परी कर दी है।लिखा गया था 'पी एम' को लेकिन मांग पर अमल किया दिल्ली की लोकल स्वशासी निकाय ने।
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| (कलाम के नाम पर ओरंगजेब से जुडे इतिहास के अप्रिय पन्नों फिजां पर थोपी असहष्णुणता (नान टालरेंस) को बढावा देने वाली एक बहस) |
फैसला गलत है या सही
मामला हाईकोर्ट में पहुंच जाने के बाद समय ही बतायेगा किन्तु भारत में सडकों और
इमारतों के नाम बदलने का खेल आजादी के जश्न
के साथ ही शुरू हो गया था। 14अगस्त 1947 से 1966 तक केवल दिल्ली
में ही जमकर नाम बदले गये।इसके बाद तो गैर कांग्रेसवाद के युग की शुरू हो जाने के बाद यह बीमारी देश के अन्य राज्यों और उनके छोटे शहरों में भी फैली।
में ही जमकर नाम बदले गये।इसके बाद तो गैर कांग्रेसवाद के युग की शुरू हो जाने के बाद यह बीमारी देश के अन्य राज्यों और उनके छोटे शहरों में भी फैली।
जहां तक आगरा का सवाल
है,मुगल एम्पायर का मुख्य केन्द्र रहा है।ओरंगजेब से संबधित प्रमुख घटनायें
यहीं घटित हुयीं।आगरा में औरंगजेब रोड तो नहीं उसके खिताबी नाम आलमगीर ( स्वंय को दिया हुआ शाही नाम जिसका अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम पर बसा आलमगंज (तोता ताल के पास) यहां का एक पुराना मौहल्ला अब भी
अपनी अलग पहचान रखता है।,दारा के विरुद्ध उसका एतिहासिक अभियान यही के समोगर
(समूहगढ गांव –विकास खंड बरौली अहीर में हुआ।यहीं के किले में उसने अपने पिता
शाहजहां को कैद कर अघोषित फर्मान जारी कर डाला कि अशक्तों को सत्ता में नहीं
रहने देना चाहिये फिर चाहें सगा बाप ही बादशाह क्यों नहीं हो।
जो भी हो ओरंगजेब की
मुगल इतिहास में मत्वपूर्ण भूमिका रही है,चाहें रोड का नाम रखें या फिर हटायें
बिना औरंगजेब को जाने मुगल ही नहीं जाट,मराठा इतिहास को भी नहीं पढा जा
सकता।लुटियन जोन से उसके नाम पर बनी सडक का नाम जरूर अब्दुल कलाम रोड कर दिया
गया है किन्तु उसके नाम पर रखे देश के 177 नगरीय निकायों एवं गांव पंचायतों के
नाम शायद ही बदले जा सकें।वैसे तो नाम परिवर्तन की अब भी तीखी प्रतिक्रिया हुई
है और अब्दुल कलाम और ओरंगजेब के जीवन की उपलब्धियों केे बीच तुलना का काम शुरू
हो गया किन्तु अगर यह खेल आगे भी चला
आने वाले समय में और भी मुश्किलें और घटिया स्तर की बहस शुरू हो जायेगी।
