--भाजपा, शत्रु को हाशिये पर डाले रख ही समाजवादियों से लेगी मोर्चा
नई दिल्ली : आने वाले बिहार चुनाव के परिणाम
राज्य की सत्ता में भले ही कोई बडा परिवर्तन ला
सके या नहीं किन्तु राष्ट्रीय
राजनीति का मौजूदा परिवेश तेजी के साथ प्रभावित होने जा रहा है।राज्य में
मौजूदा समाजवादी गठबन्धन सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।जेडीयू के ज्यादातर
राष्ट्रीय नेता अपनी मौजूदगी संसद में बनाये रखना चाहते हैं,इसके लिये बिहार के
रास्ते ही राज्यसभा में पहुंचना उनका लक्ष्य है। राजद खुद पशोपेश में है, अगर पर्याप्त
सीटें नहीं मिल सकीं तब राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाये रखना मुश्किल हो
जायेगा।बिहार में समाजवादी गठबन्धन की उपलब्ध मुख्यमंत्री नितीश कुमार की छवि
और मांझी द्वारा जेडीयू को दिये गये झटके से आये डैमेज कंट्रोल पर टिकी हुई है। इसके
अलावा समाजवादी भाजपा के बागी होने की ओर तेजी के साथ बढ रहे सांसद शत्रुघ््न सिन्हा
से काफी आस लगाये हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि शत्रु अगर मौजूदा लाइन पर ही
चलते रहे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमितशाह का जादू बिहार में ज्यादा
असरदार नहीं रह जायेगा।
श्री
सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर करचुके
हैं। हाल में ही उन्होंने एक और बयान में कहा है कि किसी को बिहारियों के सम्मान
को चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। शत्रुघ्न ने शुक्रवार को एक ट्वीट में कहा, 'बिहार मेरी कमजोरी और मेरी मजबूती दोनो है। मुझे यहां 'बिहारी बाबू' के नाम से काफी प्यार
मिला है। किसी भी पार्टी या व्यक्ति को अनजाने में भी यहां की जनता के सम्मान को
चोट नहीं पहुंचानी चाहिए।'
उल्लेखनीय है कि
मोदी ने जेडीयू-बीजेपी गठबंधन तोड़े जाने का संदर्भ लेते हुए बिहार रैली में कहा
था कि नीतीश कुमार के डीएनए में ही कोई खराबी है, जिस पर नीतीश ने मोदी
पर आरोप लगाया था कि वह पूरे बिहार के डीएनए पर सवाल कर रहे हैं।
बताया जाता है कि श्री सिन्हा बिहार के भावी मुख्यमंत्री के रूप में अपना नाम पार्टी की ओर से प्रचारित करवाना चाहते थे ,कीर्ती आजाद उनके साथ थे।किन्तु भाजपा के पुराने और राज्य की चुनावी राजनीति में जमे हुए नेता इसके पक्ष में नहीं थे। अब बिहार के चुनावी परिणाम जो भी हों भाजपा श्री सिन्हा का अपने चुनावी अभियान में शायद ही उपयोग करे। जहां तक पार्टी में बने रहने का सवाल है,संसद में भी पार्टी उन्हे हाशिये पर रख शून्य काल और प्रश्नोत्तर तक ही सीमित कर दिये जाने की नीति ही अघोषित रूप तय हो चुकी है।जो भी हो शत्रुघ्न सिन्हा की दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल से बनी चल रही निकटता ,नितीश कुमार के प्रति उदार रुख बिहार के बाद की 2017 के लिये शुरू होने जा रही राजनीति के लिये नये संकेत दे रहा है।
बताया जाता है कि श्री सिन्हा बिहार के भावी मुख्यमंत्री के रूप में अपना नाम पार्टी की ओर से प्रचारित करवाना चाहते थे ,कीर्ती आजाद उनके साथ थे।किन्तु भाजपा के पुराने और राज्य की चुनावी राजनीति में जमे हुए नेता इसके पक्ष में नहीं थे। अब बिहार के चुनावी परिणाम जो भी हों भाजपा श्री सिन्हा का अपने चुनावी अभियान में शायद ही उपयोग करे। जहां तक पार्टी में बने रहने का सवाल है,संसद में भी पार्टी उन्हे हाशिये पर रख शून्य काल और प्रश्नोत्तर तक ही सीमित कर दिये जाने की नीति ही अघोषित रूप तय हो चुकी है।जो भी हो शत्रुघ्न सिन्हा की दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल से बनी चल रही निकटता ,नितीश कुमार के प्रति उदार रुख बिहार के बाद की 2017 के लिये शुरू होने जा रही राजनीति के लिये नये संकेत दे रहा है।
