16 अक्टूबर 2014

मुगलों का अपना ही शहर ‘आगरा’ ,भूला मुगल सम्राट अकबर को

    (सि‍कन्‍दरा:थामस डैनि‍यल द्वारा 1795 में खींचा गया चि‍त्र !
आल्‍बर्ट म्‍यूजि‍यम लंदन से सभार)


--केवल शाहजहां का ही उर्स याद रहता है’ताज सि‍टी’ को                         

   --फतेहपुर सीकरी और सि‍कन्‍दरा जीवंत करते है सम्राट के साम्राज्‍य की रही बुलन्‍दी को 


आगरामुगल सम्राट अकबर का जन्‍म दि‍वस पि‍छले सालों की तरह ही बि‍ना कि‍सी कार्यक्रम या बडे आयोजन के बीत गया।अन्‍य स्‍थानों के लि‍ये तो यह सामान्‍य माना जा सकता है कि‍न्‍तु  उस शहर में इसे भुलाया जाना अपने आप में वि‍चारणीय है जि‍सके अर्थतंत्र में मुगल वि‍रासत खास कर अकबर की फतेहपुर सीकरी और सि‍कन्‍दरा अपने कि‍स्‍म का अब भी योगदान देते हों। वैसे भी मराठा काल तक अकबराबाद के ही नाम से ‘ अकबराबाद’ के रूप में भी आगरा की अपनी पहचान के साथ ही तत्‍कालीन व्‍यवस्‍थाओं के शासकीय रि‍कार्डों में दर्ज रहा है....

 अपने पचास साल के शासनकाल में अकबर ने अधि‍कांश बडे नि‍र्णय यही से लि‍ये हैं।जहां उसने राजधानी के रूप में आगरा के उपनगर फतेहपुर सीकरी का उपयोग कि‍या वहीं उसकी मजार सि‍कन्‍दरा में है।आगरा के अंतरि‍म भाग के रूप में शामि‍ल सि‍कन्‍दरा कभी बहि‍श्‍ताबाद (कब्रि‍स्‍तान) के नाम से जाना जाता था और यमुना नदी ठीक अकबर के मकबरे की इमारत की बाहरी दीवार से लगकर बहती थी।
मुगल बादशाहों के शासनकाल में आगरा का सबसे अधि‍क महत्‍व भले ही अकबर के समय रहा अकबर का हो कि‍न्‍तु वर्तमान में शाहजहां के शहर के रूप में अधि‍क प्रचार मि‍ला है।

     (अकबर की उपलब्‍ध आधि‍कारि‍क पेंटिंगें में से एक हि‍न्‍दू  चि‍तेरे मनोहर दास का चि‍त्र)

कम से कम उर्स तो होना ही चाहि‍ये
आगरा के अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍वरूप और बृज की संस्‍कृति‍ के संरक्षण को समर्पि‍त ‘बृज हैरीटेज कंजर्वेशन सोसायटी’ सोसायटी  के अध्‍यक्ष सुरेन्‍द्र शर्मा ने कहा है कि‍ जब जरूरत पडती है तो  राजनैति‍क क्षेत्र हो या फि‍र 
 (फतेहपुर सीकरी के इबादत खाना में आयोजि‍त
अकबर का धार्मि‍क दरबार)
सांस्‍कृति‍क क्षेत्र हो अकबर के ‘सुलहकुल’ या ‘दीन ए इलाही’ को तो जरूर याद कर लि‍या जाता है कि‍न्‍तु इसके प्रति‍पादक अकबर को आगरा तक में भुलारखा गया है। सरकारी वि‍भागों परतो कुछ भी कहना गैर जरूरी है कि‍न्‍तु सामाजि‍क संगठनों और उनसंस्‍थानों  को जरूर तो उससे जुडी तारीखें याद रखनी ही चाहि‍ये जहां इति‍हास का पठन पाठन होता है ।

 आठ हजार पौड में नीलाम हुआ अकबर को लि‍खा शाही खत

हुमायुं के द्वारा अफगानि‍स्‍तान से अपने बेटे अकबर को को एक शाही खत लि‍खा था।यह खुशनवी(कैलीग्राफी) में लि‍पि‍बद्ध है,यह जनवरी 1551 में हुमायू की ओ मोहम्‍मद हुसेन के द्वारा लि‍खा गया गया है।जो उसका आफीशि‍यल राइटर होगा।पत्र का पुरासाक्ष्‍य के रूप में 8हजार पौड का मूल्‍यांकन कि‍या गया है,और नीलामी के माध्‍यम से इसकी बि‍क्री भी लगभग इतनी ही राशि‍ में हुई है।इ
(हुमांयूु के द्वारा अफागानि‍स्‍तान से अकबर को लि‍खा शाही खत)
से कि‍सने खरीदा है इसे न तो आक्‍शनर क्रि‍स्‍टी की ओर ही स्‍पष्‍ट कि‍या गया है और नहीं खरीदने वाले ने। वैसे पि‍ता द्वारा युवराज अकबर को लि‍खवाया यह पत्र  उन महत्‍वपूर्ण दस्‍ताबेजों में से एक माना जा सकता है जि‍सकी सबसे सटीक जगह आगरा में बनने को प्रस्‍तावि‍त मुगलि‍या थीम के म्‍यूजि‍यम मे ही हो सकती है।

भारत सरकार उदासीन

यह बात अलग है कि‍ भारत सरकार का संस्‍कृति‍क वि‍भाग लंदन के होने वाले इस प्रकार के आक्‍शनों के प्रति‍ पूरी तरह से उदासीन रहता है।