--क्रिकेट के ‘भगवान’ से देश को बडी पहल की उम्मीद
--खेल के मैदान ही कम कर
सकते हैं अपतालों की जरूरत:नेहरू
--खेल के मैदान ही कम कर सकते हैं अपतालों की जरूरत:नेहरू
आगरा,फिल्म स्टार अमिर खान ने अपनी पौपुला टेलीविजन श्रंखला के
नवीनतम चरण की शुरूआत उन स्वयं सेवी संगठनों और व्यक्तियों की जानकारी देश के
सामने लाने के प्रयास के साथ की है जो कि उद्धेश्य हीन जीवन जीने वाले युवाओं को
खेल के रास्ते समाज की मुख्यधारा में जोडने को सत्त प्रयत्नशील हैं।

भावना से जुडा होने की याद दिलवायी।अमिर का भी कार्यक्रम के माध्यम
चुनाव और एफीलेशन के अपने अपने नियम और तरीके हैं।कुल मिलाकर खेल गर्तमें हैं।व्यवहार में पूरा ध्यान केवल जीतने और ग्रांटों को ठिकाने लगाने पर दिया जाता है।सशक्त टेलिविजन माध्यम का एकाधिकारी की तरह उपयोग करने की क्षमता रखने वाले अमिर काश खेल के नाम पर सरकारी पैसे के दरियादिली से खर्चकरने की व्यवस्था पर भी बहस करवा सकते ।
इसी कार्यक्रम में जब मीडिया और अपने प्रशंसकों के द्वारा ‘क्रिकेट
के भगवान’ सम्मान से विभूषित सचिन तेन्दुलकर ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा
कि वह राज्यसभा सदस्य की हैसियत से खेलों की मौजूदा हालातों में सुधार करना
चाहते हैं।बेहद खुशी हुई और उम्मीद जागी कि शायद दादा ध्यानचन्द को ‘भारत रत्न
‘ सम्मान से सम्मानित करने की जनअपेक्षा तो वह पूरी करने का प्रयास वे करेगे
ही।वैसे भी गंदगी साफ करने वाली पी एम की नौ रत्न टीम में वह है और सडक की गंदगी
से कही अधिक खेल संगठनों में मची आपाधापी को दूर करने में उनकी भूमिका अधिक
महत्वपूर्ण हो सकती है।
![]() |
| (ध्यान चन्द्र की ग्रहनगर झांसी मेंं स्थित प्रतिमा) |
जहां तक महान खिलाडी ध्यान चन्द का वाल है,वह अपने आप में बेमिसाल
थे।उस दौर के थे जब खिलाडी को भगवान का दर्जा प्राप्त करने का वक्त आने में सत्तर
साल का वक्त था।अपने दमखम पर ही सबकुछ करना था जिसमें बर्लिन ओलम्पिक में भाग
लेने पानी के जहाज जाने को पचास हजार की राशि चन्दा कर जुटाना भी शामिल था।देश
भले ही गुलाम था किन्तु टीम का हवाभाव स्वतंत्र राष्ट्र उन्मुख् था।तभी तो
ध्यानचन्द ने जर्मन की नागरिक्ता और सेना मे कर्नल बनाये जाने का प्रस्ताव विनम्रता
से ठुकराकर हिटलर की ‘स्पोर्ट डिप्लोमेसी’ को शुरू होने से ही पूर्व खारिज कर
दिया था। ध्यान चन्द जी की मृति में
नेशनल स्पेर्ट डे का आयोजन होता है,इंडिया गेट के पास उनकी एक स्टैच्यू भी
है।उनके शहर झांसी में भी एक ऊंची टकडी पर उनकी प्रतिमा है। दैनिक जागरण में झांसी
की रानी के वकील जोह्न लेंग पर एक रिपोर्ट लिखने के दौरान सिटी इंचार्ज के रूप
में कार्यरत अपने सहयोगी श्री राहुल सिघई जो कि झांसी के ही है से जानना चाह कि
वहां भी कुछ खास काम भावी पीढी को ‘दादा’ से प्रेरणा लेने के किया गया है।,इस पर
जो जानकारियां उन्हे थी बतायी साथ ही सहमति व्यक्त की कि कुछ और बडा काम
होना चाहिये।।कुछ ही दिनों बाद झांसी म्यूजियम देखने का अवसर मिला उम्मीद थी
कि शायद कोई व्यवस्थित गैलरी इस माहनायक को समर्पित हो। राज्यपुरातत्व विभाग
वाले सहमत थे और इसे झासी के इतिहास का पूरक भी मानते हैं। किन्तु सरकार की जो
व्यवस्था हे उसमें अपनी ओर से छोटे विभागीय अफसर कुछ करने की स्थिति में
नहीं होते हैं।अगर कोई समझदार नेता आया तभी शायद आने वाले समय में यह संभव हो सकेगा।खेल के इतिहास के वे क्षण जिन्ा पर हर भारतीय को गर्व है ।जब हिटलर की स्पोर्ट डिप्लेमेसी को धराशाही कर आया था हाकी का एक कप्तान।
मून ओलम्पिक बडा गैर क्रिकिटिया आयोजन
![]() |
| (मून ओलम्पिक,आगरा :फाइल फोटो) |
खेल नीति की बुनियाद मेजर ध्यान चन्द ने
मेजर ध्यान चन्द के जीवन बृत्त के वे लहमें जिन पर हरभारतीय गर्व
करता है। हकीकत में खेल नीति की शायद ये ही असली बुनियाद थे।जिसे देश की आजादी
से कहीं पहले दूसरे विश्वयुद्ध के शुरू होने से पहले ही डाला जा चुका था।

