22 मार्च 2026

वारली चित्रकला: कैसे आज भी जीवित है हजारों साल पुरानी परंपरा

 

मधुकर रामभाऊ वाडू ने मात्र आठ साल की उम्र में वारली पेंटिंग सीखना शुरू किया था और पिछले लगभग पाँच दशकों से इस कला को समर्पित हैं। आज 56 वर्ष की उम्र में वे सिर्फ एक कलाकार ही नहीं, बल्कि लेखक, शोधकर्ता और इस परंपरा के समर्पित संरक्षक भी हैं। उन्होंने अपना जीवन वारली कला के संकेतों और उसके गहरे अर्थों को समझने में लगाया है। उनका मुख्य जुनून उस अदृश्य संबंध की खोज करना है, जो प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों और प्राचीन पेट्रोग्लिफ्स को वारली कला से जोड़ता है।
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वारली चित्रकला, महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध लोक कला परंपरा है, जिसे वारली जनजाति द्वारा पीढ़ियों से संजोया गया है। इसकी जड़ें 10वीं शताब्दी ईस्वी या उससे भी पहले, नवपाषाण युग (करीब 2,500–3,000 ईसा पूर्व) तक मानी जाती हैं। यह कला प्रकृति के साथ गहरे

जुड़ाव को दर्शाती है। चूंकि खेती इस जनजाति के जीवन का आधार है, इसलिए प्राकृतिक तत्व उनकी कला का मुख्य हिस्सा बनते हैं।

परंपरागत रूप से, कलाकार मिट्टी की झोपड़ियों की दीवारों को ही कैनवस के रूप में इस्तेमाल करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन गुफा चित्रों में देखा जाता है। चावल के पेस्ट से बने सफेद रंग का उपयोग कर वे सरल ज्यामितीय आकृतियों वृत्त, त्रिकोण और वर्ग के माध्यम से जीवन के विविध पहलुओं को उकेरते हैं। इन चित्रों में खेती, शिकार, गांव के अनुष्ठान और प्रसिद्ध तारपा नृत्य के दृश्य जीवंत रूप में दिखाई देते हैं। हर चित्र अपने आप में समुदाय और प्रकृति के बीच एक संवाद को दर्शाता है।

मधुकर के लिए, जनजातीय कला महोत्सव जैसे आयोजन सिर्फ प्रदर्शनियां नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उनका मानना है कि आदिवासी कला को व्यापक पहचान दिलाने के लिए ऐसे महोत्सव देश के अलग-अलग हिस्सों में अधिक बार आयोजित होने चाहिए।