1 अप्रैल 2016

भुखमरी के कागार पर जा पहुंचे बुंदेलखंड को लेकर 'यू पी सरकार' को नोटिस

बतायें ‘नमक की रोटी और आलू मात्र से कैसे स्‍वस्‍थ्‍य रहा जा सकता है’

(बूंदबूद को तरसते कंठ)

लखनऊ: प्रदेश के विकास के दावे करके 2017 में चुनाव के मैदान में फिर बाजी मारने के इरादे रखने वाली समाजवादी पार्टी की यू पी सरकार को एक बार फिर से उस समय भारी धक्‍का लगा जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने शुक्रवार को नोटिस जारी कर मुख्‍य सचिव जानना चाह है  कि लोग महज आलू या नमक के सहारे रोटी खा कर स्वस्थ कैसे रह सकते हैं। हाल में ही बुंदेल खंड के तहत आने वाले 13 जनपदो के सम्‍बन्‍ध मे मीडिया विस्‍तार से रिपोर्टें आी है जिनमें स्‍थानीय जनजीवन के लिये जीवन यापन को जरूरी.. न्‍यूनतम वस्‍तुओं व सुविधायओं का नितांत अभाव बताया गया है।जनक्षेत्रों के संबध में रिपोर्टें आयी हैं,इनमें से कुछ भाग म प्र का भी है,जिसके लिये वहां के मुख्‍य सचिव को भी नोटिस जारीकरदिया गया है।मनमोहन सिह सरकार के समय से अब तक केन्‍द्र के द्वारा बुंदेलखंड को कईबार बडे बडे पैकेज दियेजाते रहे। किन्‍तु उत्‍तर प्रदेश सरकार की अफसरशाही कभी भी जमीनी तौर पर इन पैकेजों के तौर पर मिले धन से काम नहीं करवा सकी। बुंदेल खंड के अधिकांश जनपदों में इस समय नौकरी या अन्‍य किसी भी प्रकार रोजगार परक काम का नितांत अभाव है।बडी संख्‍या ऐसे लोगों की है जो कि अन्‍य कहींपलायन भी नहीं कर सकते। नदियां सूखीहुई है, सभी मुख्‍य बांधों में पानी का नितांत अभाव है। इसकी मुख्‍य वजह वर्षा का सीमित होने से भी अधिक सिचाई और पेयजल योजनाओं का सही तरह से क्रियान्‍वयन न हो पाना भी है।

मुख्य सचिवों से चार हफ्ते के भीतर जवाब-तलब किया है और पूछा है कि लोग महज आलू या नमक के सहारे रोटी खा कर स्वस्थ कैसे रह सकते हैं। इलाके में दलहन और चने की फसल सूखे के कारण चौपट हो गई। नतीजतन ज्यादातर लोगों को अब दालों का स्वाद तक भी याद नहीं। इनमें भूमिहीन आदिवासी ज्यादा हैं और स्कूलों में भी बच्चों को मिड-डे-मील उपलब्ध नहीं है। मनरेगा के तहत भी उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा। इससे पहले दिसंबर में मीडिया में खबर आई थी कि बुंदेलखंड के आदिवासी घास की रोटियां खा रहे हैं।