July 15, 2020

कानपूर कांड की जांच को केन्‍द्र करे जांच आयोग गठि‍त

-- एन्‍काऊंटरों से व्‍यवस्‍था के प्रति‍ सवाल उठना स्‍वभावि‍क 
'सवाल अधि‍कार सीमा लांघ कर   कानून के राज्‍य की कल्‍पना का '

आगरा: उ प्र मे न्‍यायि‍क अभि‍रक्षा और पुलि‍स अभि‍रक्षा को सुरक्षि‍त और वि‍धि‍क माना जाता है। जीवन जीने के हक को लेकर जब भी कि‍सी नागरि‍क को असुरक्षा महसूस होती है तो वह भी पुलि‍स या अदालतों के माध्‍यम से इस वि‍श्‍वास के साथ आत्‍म समर्पण करता है कि‍ वि‍धि‍ सम्‍मत व्‍यवस्‍था के अनुसार सरकारी वि‍भाग कार्य करते हैं। अगर कोई वि‍धि ‍वि‍रुद्ध कार्य या आचरण कि‍या जाता है तो न्‍यायपालि‍का के तहत संचालि‍त अदालतें उसे  न्‍याय देने का काम करेंगी।
लेकि‍न पि‍छले दो साल से
न्‍यायि‍क व पुलि‍स हि‍रासत में  हुई मौतों और मुठभेडों की घटनाओं के कारण जो संशय की स्‍थति‍यां बनी हैं , उनके  बारे में-  सरकार से अपेक्षा करते हैं कि‍ शंकाओं का समाधान करने को अपना पक्ष रखे । नेशनल क्राइम ब्यूरो के अपडेटि‍ड वि‍वरण और हाल में हुई कस्‍टोडि‍यन मौते इसका कारण हैं।
सि‍वि‍ल सोसायटी मानती हे कि‍ हाल ही में घटी कुछ एन्‍काऊंटर की घटनाओं को लेकर उठे सवालों, को दृष्‍टि‍गत उ प्र सरकार ने अपनी ओर से जो एस आई टी गठि‍त की है, और जांच आयोग भी हाईकोर्ट एक रि‍टायर्ड जज सहाब की अध्‍यक्षता में गठि‍त कर दि‍या है वह प्रशंसनि‍य है । सोसायटी का मानना है कि‍  संभवत: जनता के द्वारा उठायी गयी शंकाओं के दबाब में उपरोकत कदम उठाये गये हैं।
एस आई टी के गठन को लेकर तो फि‍लहाल कुछ भी नहीं कहना है, उसके द्वारा जांच प्रक्रि‍या में अगर समाचार पत्रों में सुर्खि‍यों में रहे मुद्दों का भी अगर समाधान कि‍या जा  सका तो एक बडी उपलब्‍धि‍ होगी। वैसे एस आई टी की जांच में संलि‍प्‍त राजनीति‍ज्ञों ,पुलि‍य अधि‍कारि‍यों तथा प्रशासनि‍क अधि‍कारि‍यों की पि‍छले पांचाल में रही भूमि‍काओं की जानकारि‍यां जांच फायल की पेपरशीटों में शामि‍ल होना अपेक्षि‍त है।
लेकि‍न जहां तक जांच आयोग का सवाल है, इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायलय के  सेवानि‍वृत्‍त न्‍यायधीश महोदय के प्रति‍ अपना पूरा सम्‍मान व्‍यक्‍त करते हुए "The Commissions of Inquiry Act, 1952".के तहत जारी  नोटि‍फि‍केशन के बारे में जानकारी चाहते हैं  कि‍   आयोग का कार्यक्षेत्र उ प्र की सीमा तक ही सीमि‍त है अथावा वे सभी राज्‍य भी इसके तहत आते हैं जहां जहां अपराधी सरगना और उसके गैंगके साथि‍यों की सरगर्मि‍यां रहीं थीं। सामान्‍य रूप से रि‍टायर्ड हाईकोर्ट जजों की अध्‍यक्षता में गठि‍त जांच आयोगों का जांच अधि‍कार क्षेत्र वह राज्‍य ही होता है जि‍सके राज्‍यपाल ने सरकार की सि‍फारि‍श पर आयोग को गठि‍त कि‍या हो।
सि‍वल सोसायटी आगरा की प्रेस कांफ्रेंस  में मुखरि‍त 'असहमति‍ के स्‍वर'
वैसे अधि‍क  उपयुक्‍त होगा कि अपराधि‍यों की सरर्गि‍यों का कार्यक्षेत्र कई राज्‍यों में होने को दृष्‍टि‍गत उ प्र सरकार स्‍वयं आयोग गठि‍त न कर "The Commissions of Inquiry Act, 1952" के तहत भारत सरकार से इसे अधि‍सूचि‍त करवाती और सुप्रीम कोर्ट के रि‍टायर्ड नयधीश इसके अध्‍यक्ष होते।  अपराधी की पर संपत्‍ति‍यों और अर्थ तंत्र का वि‍वरण आयकर वि‍भाग के एन्‍फोर्समेंट डायरैक्‍टर के द्वारा जि‍स प्रकार से तलब कि‍या गया है उससे लगता है कि‍ कई प्रभावशाली सफ़ेदपोश सरगना की  काली कमाई में करने और प्रबंधन में भागीदार होंगे।जि‍नमें से कुछ के उ प्र की सीमा से बाहर होने की भी संभावना स्‍वभावि‍क है। अत: जांच आयोग का दायरा बढाा जाये अथावा सुप्रीम कोर्ट के कि‍सी रि‍टायर्ड न्‍यायधीश की अध्‍यक्षता मे भारत सरकार से इसे पुन अधि‍सूचि‍त करवाये।
डा भीम राव अम्‍बेडकर वि‍ वि‍ के 'समाज वि‍ज्ञान संस्‍थान ' के पूर्व नि‍देशक शि‍क्षा वि‍द डा ब्रजेश चन्‍द्रा  का कहना है कि‍ भारतीय संवि‍धान की पवि‍त्रता तभी कायम रह सकती है जबकि‍ उसके सभी आधार स्‍थंभ मजबूत हों। व्‍यवस्‍थापि‍का, कार्यपालि‍का और न्‍यायपालि‍का के कार्य क्षेत्र बाक़ायदा तय हैं । लेकि‍न कुछ कांडों में कार्य क्षेत्रों की मर्यादा का ध्‍यान नहीं रखा जाता और उल्‍लंघन करने वाले पूरी व्‍यवस्‍था की पवि‍त्रता व पारि‍दर्शि‍ता पर प्रश्‍न चि‍न्‍ह खडे करवा देते हें। हाल में ही कानूपर कांड में कुछ इसी तरह का हुआ।
डा चन्‍द्रा ने कहा कि‍  समाज शास्‍त्री होने के नाते खुद मानता हूं कि‍ अपराधी को कडी से कडी सजा मि‍ले कि‍न्‍तु सजा देने को अधि‍कृत न्‍यायपालि‍का का काम जब कोई अन्‍य कर देता है तो अपने आप में स्‍वत: ही कई प्रश्‍न खडे हो जाते हैं। दरअसल पुलि‍स व्‍यवस्‍थापि‍का का एक अंग हैं और उसे अपराधी को पकड़कर अदालत में पेश करने के अलावा सजा देने का कोई हक नहीं है । इस कांड में यही हुआ है।  
वे कहते हैं कि‍ वि‍धि‍स्‍थापि‍त व्‍यवस्‍था से संचालि‍त राज्‍य का समर्थक तथा संवि‍धानि‍क व्‍यवस्‍था में आस्‍था रखने के कारण कार्यपालि‍का के कि‍सी भी अंग के द्वारा न्‍यायपालि‍का के अधि‍कार क्षेत्र में अति‍क्रमण करने के कि‍सी भी प्रयास को गलत मानता हूं और लोकतांत्रि‍क मूल्‍यो के हि‍त में इसका वि‍रोध करता हूं।
अधि‍वक्‍ता श्री अमीर अहमद  का भी ऐसा ही  मत है ।उनका कहना हे कि‍ पुलिस का काम लोगों से कानून का पालन करवाना है तथा जो कानून तोड़े अपराध करे उसको गिरफ्तार करके न्यायालय के समक्ष पेश करना है। देश का कोई भी कानून पुलिस को ये अधिकार नहीं देता कि वह अपराध की खुद सजा तय करके अपराधी को दंडित करे। कानपुर की घटना में पुलिस ने जिस तरह से कानून की धज्जियाँ उड़ाई हैं वह अत्यंत चिंताजनक व निंदनीय है। 6 लोगों को पकड़ कर उन्हें गोली मारकर हत्या करके उसे एनकाउंटर का रुप दिया गया है। 
उन्‍होंने कहा कि‍  किसी के मकान को बिना सक्षम अधिकारी के आदेश के पूरी तरह से गिरा दिया जाना और उसमें खड़े वाहनों को नष्ट कि‍ये जाने जैसा काम पहली बार देखने को मि‍ला है। जो कि‍ मेरी दृष्‍टि‍ में  एक खतरनाक शुरुआत है। 
इस अवसर पर सि‍वल सोसायटी ब्राह्मण समाज के द्वारा की जा रही  शंकाओं और आक्रोश को सामायि‍क एवं ततकालि‍क प्रति‍क्रि‍या मानती है  और सरकार से उम्‍मीद करती है कि‍ समाजके कि‍सी वर्ग में इस प्रकार का भाव आये तो  उसे दूर करना चाहि‍ये। प्रख्‍यात हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यकार एवं जालमा लि‍प्रौसी इंस्‍टीट्यूट की पूर्व हि‍न्‍दी अधि‍कारी डा मधुभारद्वाज का कहना है कि‍ सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि‍ अपने दायि‍त्‍वों का नि‍ र्वाहन जाति‍यों और धर्म से ऊपर उठकर करेंगी।  बृह्मण समाज के प्रमुख संगठन की आगरा इकाई की अध्‍यक्ष होने के नाते वह  इतना जरूर कहती हैं कि‍ बृाह्मण वर्ग के मेघावी से मेघावी बच्‍चों के लि‍ये आगेबढने के अवसर लगातार सीमि‍त हो रहे हैं ।एक नहीं कि‍तने भी अपराधि‍यों को उनके अंजाम तक पहुंचाइये कि‍न्‍तु उन लोगों के बारे में भी वि‍चार करें जो कि‍ सम्‍मान के साथ अपने ज्ञान,हुनर से जीवन यापन करना चाहते हैं लेकि‍न सीमि‍त होते अवसरों के कारण पि‍छले कई साल से भारी आर्थि‍क चुनौति‍यों का सामना करने को मजबूर हैं।   आगरा प्रोग्रेसिव ग्रुप  के   संयोजक कर्नल (रि‍.) सुनील चोपड़ा ,पार्षद डा  शिरोमणि सिंह  अनिल शर्मा. और श्री राजीव सक्सेना भी प्रेस वार्ता में शामि‍ल थे।