20 सितंबर 2026

आगरा की स्वच्छता के लिए नई उम्मीद : तीन ब्रांड एंबेसडर क्या बदल सकते हैं?

 

आगरा नगर निगम ने स्वच्छता के लिए नितिन जोहरी, वंदना और आर. पी. सक्सेना को ब्रांड एंबेसडर बनाया है। तीनों को मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वे इस नई जिम्मेदारी को केवल एक औपचारिक पद के रूप में नहीं, बल्कि आगरा के लिए कुछ अच्छा करने के एक अवसर के रूप में लेंगे।

मेरे लिए यह इसलिए भी अच्छी खबर है क्योंकि आगरा जैसा शहर स्वच्छता के मामले में थोड़ा और ध्यान मांगता है। आगरा सिर्फ ताजमहल का शहर नहीं है। यह हमारा घर है, हमारी रोजमर्रा की जिंदगी है और हर दिन यहां रहने वाले लाखों लोगों की अपनी जगह है। हर साल देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी इसी शहर को देखते हैं। इसलिए आगरा साफ और सुंदर हो, यह केवल पर्यटन की जरूरत नहीं, बल्कि यहां रहने वाले हर व्यक्ति की जरूरत है।

लेकिन यहां एक बात बहुत जरूरी है। शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर निगम या सफाई कर्मचारियों की नहीं हो सकती। नगर निगम को अपनी व्यवस्था बेहतर करनी ही चाहिए और सफाई कर्मचारियों की मेहनत का सम्मान भी होना चाहिए, लेकिन जब तक हम नागरिक अपनी आदतों पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक पूरी तस्वीर बदलना मुश्किल है।

स्वच्छता की शुरुआत हमारी अपनी आदतों से होनी चाहिए

हम अक्सर सड़क पर कूड़ा देखकर कहते हैं कि नगर निगम को सफाई करनी चाहिए। यह बात अपनी जगह सही है। कूड़ा उठना चाहिए, सफाई व्यवस्था ठीक होनी चाहिए और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल होनी चाहिए। लेकिन कभी-कभी हमें खुद से भी पूछना चाहिए कि सड़क पर पड़ा वह कूड़ा आया कहां से?

अगर कोई सफाई कर्मचारी सुबह किसी जगह की सफाई करके जाता है और कुछ घंटे बाद उसी जगह फिर कचरा दिखाई देने लगे, तो समस्या केवल

सफाई व्यवस्था की नहीं है। वहां हमारी आदत भी जिम्मेदार है।

मुझे लगता है कि इन तीनों ब्रांड एंबेसडरों के सामने सबसे बड़ा काम यही है कि वे लोगों को केवल "कूड़ा मत फैलाइए" न कहें। उससे आगे जाकर लोगों के मन में यह भावना पैदा करें कि "यह मेरा शहर है और इसे साफ रखना मेरी भी जिम्मेदारी है।"

आगरा में बहुत से लोग अपने घरों को बहुत साफ रखते हैं। लेकिन कई बार घर से बाहर निकलते ही वही सफाई की सोच पीछे छूट जाती है। हमें शायद यह समझने की जरूरत है कि घर के बाहर की सड़क, मोहल्ले का पार्क, बाजार और सार्वजनिक स्थान भी हमारे ही हैं। अगर हम अपने घर के फर्श पर कचरा नहीं डालते, तो सड़क को गंदा करना भी हमारी आदत का हिस्सा नहीं होना चाहिए।

मेरी नजर में स्वच्छता को लेकर लोगों को सिर्फ नियमों से नहीं, अपनेपन से जोड़ना ज्यादा जरूरी है। जब किसी व्यक्ति को लगेगा कि "यह मेरा आगरा है", तब शायद उसे सड़क पर कचरा फेंकने से पहले एक बार सोचना पड़ेगा।

बच्चों, बाजारों और मोहल्लों से शुरू हो सकता है बदलाव

अगर स्वच्छता की सोच को लंबे समय तक बदलना है तो बच्चों और युवाओं को इस अभियान से जोड़ना बहुत जरूरी है। बच्चों को सिर्फ स्वच्छता पर भाषण देने से ज्यादा अच्छा होगा कि उन्हें रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों के बारे में समझाया जाए। कूड़ा कहां डालना है, गीला और सूखा कचरा अलग क्यों रखना चाहिए और सार्वजनिक जगहों को साफ रखना क्यों जरूरी है—ये बातें अगर छोटी उम्र में समझ आ जाएं तो आगे चलकर उनका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है।

कई बार एक बच्चा अपने माता-पिता को सड़क पर कचरा डालने से रोक देता है। मुझे लगता है कि उस एक बच्चे का सवाल किसी बड़े अभियान से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

आगरा के बाजारों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया जा सकता है। अगर दुकानदार अपनी दुकान के साथ सामने की जगह को भी साफ रखने की जिम्मेदारी लें, तो बाजारों की तस्वीर काफी बदल सकती है। इसके लिए केवल नियम या जुर्माना ही जरूरी नहीं है। जो बाजार और दुकानदार लगातार सफाई का ध्यान रखते हैं, उन्हें सम्मानित किया जाए और उनकी अच्छी मिसाल दूसरे लोगों के सामने रखी जाए। इससे स्वच्छता धीरे-धीरे मजबूरी के बजाय गर्व की बात बन सकती है।

मोहल्लों में भी छोटी-छोटी पहल की जा सकती हैं। किसी पार्क को साफ रखने की जिम्मेदारी स्थानीय लोग लें, किसी इलाके में कचरा न फैलाने की पहल हो या लोग मिलकर यह तय करें कि उनके आसपास की सड़क गंदी नहीं होगी। ऐसे प्रयास शायद बहुत छोटे लगें, लेकिन शहर आखिर ऐसे ही छोटे-छोटे हिस्सों से मिलकर बनता है।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी इस काम में बहुत अच्छे तरीके से किया जा सकता है। केवल सफाई अभियान की तस्वीरें डालने के बजाय उन लोगों की कहानियां सामने लाई जानी चाहिए जो अपने स्तर पर कुछ अच्छा कर रहे हैं। कोई दुकानदार अपनी दुकान के आसपास सफाई रखता है, कोई स्कूल बच्चों को स्वच्छता की आदत सिखा रहा है या कोई मोहल्ला अपने पार्क को साफ रखने की कोशिश कर रहा है—ऐसी वास्तविक कहानियां लोगों को ज्यादा प्रेरित कर सकती हैं।

ताजमहल से आगे भी है हमारा आगरा

आगरा की पहचान पूरी दुनिया में ताजमहल से होती है। लेकिन हमारे लिए आगरा सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं है। यहां हमारे घर हैं, हमारे बाजार हैं, हमारे स्कूल हैं, हमारे मोहल्ले हैं और हमारी रोज की जिंदगी है।

जो पर्यटक आगरा आता है, वह ताजमहल जरूर देखता है, लेकिन रास्ते में जो शहर देखता है, उससे भी उसके मन में आगरा की एक तस्वीर बनती है। इसलिए स्वच्छता का प्रयास केवल ताजमहल या दूसरे प्रमुख पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली बदलाव तब होगा जब शहर के आम मोहल्ले और बाजार भी साफ दिखाई देंगे।

और इसमें सफाई कर्मचारियों की भूमिका को भूलना भी ठीक नहीं होगा। वे हर दिन शहर को साफ रखने के लिए मेहनत करते हैं। अगर हम कचरा इधर-उधर फैलाना कम कर दें, तो उनके काम का बोझ भी कम होगा। उनके प्रति सम्मान का सबसे अच्छा तरीका शायद यही है कि हम गंदगी पैदा करने से बचें।

मेरे हिसाब से इन तीनों ब्रांड एंबेसडरों की सबसे बड़ी सफलता उस दिन होगी जब लोगों को कुछ समय बाद उनके नाम से ज्यादा उनका संदेश याद रहे। जब कोई व्यक्ति सड़क पर कचरा फेंकने से पहले रुक जाए। जब कोई दुकानदार कहे कि उसकी दुकान के सामने गंदगी नहीं होनी चाहिए। जब कोई बच्चा अपने घरवालों से कहे कि कचरा सड़क पर नहीं डालना चाहिए।

तब लगेगा कि बात सिर्फ अभियान तक नहीं रही, बल्कि लोगों की सोच में थोड़ा बदलाव आया है।

नितिन जोहरी, वंदना और आर. पी. सक्सेना जी को मेरी ओर से एक बार फिर बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आगरा को स्वच्छ बनाने का काम आसान नहीं है, लेकिन अच्छी शुरुआत हमेशा किसी न किसी छोटे कदम से होती है।

नगर निगम अपनी जिम्मेदारी निभाए, सफाई कर्मचारी अपनी मेहनत करते रहें और हम नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें—तभी बात बनेगी।

आखिरकार स्वच्छ आगरा सिर्फ नगर निगम का सपना क्यों हो? यह हम सबका सपना होना चाहिए।

और इसकी शुरुआत शायद किसी बड़े अभियान से नहीं, बल्कि हममें से हर व्यक्ति के एक छोटे से फैसले से हो सकती है—

"मैं अपने शहर में गंदगी नहीं फैलाऊंगा।"